उठी थी। इसलिए विवश होकर उन्हें कछ समय के लिए कार्य बन्द करना पड़ा। इसके पश्चात् जीवनचरित्र सम्बन्धी सारे
कागज मुझ को सौंप दिये गये परन्तु पं० लेखराम जी के लेख को पढ़ना बड़ा कठिन काम था। मेरी रिपोर्ट पर
आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब ने समस्त कागज राय ठाकुरदत्त जी को सौंप दिये परन्तु जब उन्होंने भी कागजों को अधुरा
बताया तो फिर पं० लेखराम जी को ही प्रकाशन का कार्य आरम्भ करने के लिए लाहौर में ठहराया गया।

पं लेखराम का बलिदान और कार्य में स्काउट- पडित लेखराम जी ने यद्यपि लाहौर में रह कर अपने सामने
लगभग ६०० पृष्ठों का विषय प्रेस के कातिलों को लिखवा दिया था तथापि यह लेख अभी तक अपर्ण था क्योकि घटनाओं
का बहुत-सा अंश केवल पंडित जी के मस्तिष्क में ही था जो कि कापियां संशोधन करते समय उन्होंने पुस्तक में सम्मिलित
करना था। कुछ कागज इस प्रकार के निकले हैं जिससे विदित होता है कि अभी तक विशेष-विशेष नोट लिखने का कार्य
पंडित जी ने अवशिष्ट रख छोड़ा था। ये सब कठिनाइयां ही कछ थोड़ी न थीं कि ६ मार्च, सन् १८९७ की शाम को स्वामी
दयानन्द का जीवनचरित्र लिखते-लिखते पंडित लेखराम आर्य पथिक ने अपने रक्त से उन्नीसवीं शताब्दी के ऋषि के मिशन
की पूर्ति करने के लिए अपना बलिदान दे दिया, आर्यसमाज के संस्थापक का जीवनचरित्र पूर्ण करने के स्थान पर वह अपने
जीवनचरित्र लिखने का कार्य आर्य समाज के लिए छोड़ गये।

ला० आत्माराम ने कार्य संभाला- इस खींचातान की दशा में आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब ने बड़ी गम्भीरता और
धैर्य से काम लिया । २१ मार्च सन् १८९७ की अन्तरंग सभा के प्रस्ताव सं० ७ द्वारा स्वामी जी के जीवन वृतांत को शुद्ध
करके जनता के समक्ष रखने का कार्य ला० आत्माराम जी भूतपूर्व मंत्री आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब को सोपा गया ।

योग्यता और ज्ञान दोनों ही की दृष्टि से दूसरा कोई भी आर्यसमाजस्थ पुरुष उस समय ऐसा विद्यमान न था जो
अपना पूरा समय देकर इस कठिन भार को उठाने का साहस कर सकता। चूंकि पूफ देखने और भाषा के शुद्ध करने में प्रायः
मेरे मित्र ला0 आत्माराम जी मुझ से सम्पति लेते रहे हैं इसलिए मैं उन कठिनाइयों का अनुमान लगा सकता हूं जिनका उन्हें
सामना करना पड़ा है, परन्तु जिस संतोष और धैर्य के साथ ला० आत्माराम जी ने इन समस्त कठिनाइयों का सामना किया
है उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं क्योंकि अन्ततः उन्होंने प्रत्येक रुकावट को दूर करके वर्तमान काल के लिए श्रेष का
जीवन वृत्तांत सर्वसाधारण के अध्ययनार्थ तैयार कर दिया है।
उनके अन्य सहयोगी- परन्तु पूर्व इसके कि मैं लाला आत्माराम जी के महान् परिश्रम की प्रशंसा करूं यह उचित
प्रतीत होता है कि उन धार्मिक नवयुवकों का भी आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब की ओर से धन्यवाद करूं जिन्होंने कि ला0
आत्माराम जी की इस महान कार्य में सहायता करके पुस्तक के शीघ्र प्रकाशित होने में सहायता दी है। ला० आत्माराम जी
चूंकि विशेष कारणों से अपना निवास लाहौर में नहीं रख सकते थे, इसलिए कापी और पूफ देखने के कार्य में बड़ी कठिनाई
ती यदि इस अवसर पर कोई लाहौर-निवासी आर्य उनकी सहायता न करता । ऐसी आवश्यकता के काल में हमारे पुरुषार्थी
आर्य भाई ला० सीताराम जी लकड़ी विक्रेता ने यह साधारण किन्तु कठिन कार्य अपने ऊपर लिया । यद्यपि ला० श्यामसुन्दर
मृतसरी, ला० लब्भूराम और कुछ अन्य नवयुवक भी इस कार्य में ला० सीताराम की सहायता करते रहे जिसके लिए वे
तथा जनता के धन्यवाद के पात्र हैं, तथापि चूंकि अन्त में वर्णित समस्त नवयुवक भाई केवल ला० सीताराम की प्रेरणा
कार्य करते रहे इसलिए मैं ला० सीताराम को उनके धार्मिक उत्साह के लिए छघन्यवाद देता हूं और परमेश्वर से प्रार्थना
| हूं कि इन सब भाइयों की रुचि दिन-प्रतिदिन धर्म में बढ़ती रहे ।

ला० आत्माराम जी का योगदान- ला० आत्माराम जी ने केवल पुस्तक के उस भाग को ही शुद्ध नहीं किया
को पं० लेखराम जी नियमित रूप दे चुके थे प्रत्युत उन्होंने बहुत-सा आवश्यक और लाभदायक पुस्तक का भाग स्वयं