तैयारी तथा सम्पादन का संक्षिप्त इतिहास

अधूरा जीवनचरित्र-स्वामी दयानन्द का जीवन-वृतांत जनता के सामने रखते हुए आर्य-प्रतिनिधि रभा पंजाब
की ओर से उसकी तैयारी का संक्षिप्त इतिहास पाठकों की सेवा में रखना आवश्यक प्रतीत होता है। प्रकटतया जिस अध्रे
रूप में यह जीवनचरित्र जनता के सामने रखा जा रहा है, उसे न तो ‘बायोग्राफी’ (व्यक्तिगत जीवनवन-Biography) री
कह सकते हैं; क्योकि उसमें लेखक अपने विचारों और क्रम के अनसार घटनाओं को अपनी भाषा में लिख कर अपने
निष्कर्ष निकाला करता है, और न ही इसे केवल आर्य समाज का इतिहास ही कहा जा सकता है, व्योकि अब तक यद्यपि
आर्यसमाज का इतिहास केवल स्वामी दयानन्द का जीवन ही है तथापि इस पुस्तक में उस इतिहास की शाखाओं ने भी
पूर्णरूप से विकास नहीं पाया है और स्वामी दयानंद के जीवन का बहुत सा भाग उसमें नहीं आया है। इसलिए इन दोनों
के अतिरिक्त इस संग्रह का
कोई नवीन नाम रखे बिना जनता को इसकी
वास्तविकता का ज्ञान नहीं हो सकता। परन्तु,
इससे पूर्व कि इस पुस्तक का नामकरण संस्कार किया जाए, यह उवित प्रतीत होता है कि इसके वर्तमान रूप में
की कहानी आपको सुनाई जाये।

जीवनचरित्र की प्रबल मांग- स्वामी दयानन्द ने जिस दिन इस अनित्य भौतिक शरीर को त्याग कर बदलाव।
को प्रयाण किया, उसी दिन से लोग उनके जीवन का सम्पूर्ण इतिहास जानने की इच्छा प्रकट कर रहे थे। यह इच्छा केवल
आर्यसमाज साथ पुरुषों तक ही सीमित न थी प्रत्येक सर्वसाधारण-हिन्दू, मुसलमान और ईसाई जनता की ओर से स्वामी
दयानंद के जीवनचरित्र से परिचय प्राप्त करने की आकांक्षा पाई जाती थी । परन्तु इस आकांक्षा ने लगभग पांच वर्ष तक
कोई क्रियात्मक रूप धारण न किया। केवल समाचार पत्रों के द्वारा कभी-कभी कोई आवाज सनाई देती थी जो कि सासारिक
झगड़ों के नक्कारखाने (वाद्यालय)में तुती की आवाज के सदृश स्वयं दबकर रह जाती थी । अन्तत: क्रियात्मक आन्दोलन
एक ऐसी जगह से प्रारम्भ हुआ जो पंजाब की आर्यसमाजों के प्रारम्भिक इतिहास में एक स्मरणीय शक्ति थी । मेरा अभिप्राय
मलतान आर्य समाज से है । दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज का आंदोलन चाहे कहीं से आरम्भ हुआ परन्तु क्या इस संस्था
के तत्क्षण खोलने के आंदोलन में लाला ज्वाला सहाय जी रईस मियानी तथा सभासद आर्यसमाज मलतान के आठ हजार
रुपये के दान ने बिजली का काम नहीं किया था? फिर स्वामी दयानन्द के पश्चात् जब कि वेदों का पठन-पाठन समाप्त-सा
होता दिखाई देता था क्या मुलतान ने हमें विश्वासी और विद्वान् गुरुदत नहीं दिया जिसने कि सच्चा विद्यार्थी बन कर वेद

और परमात्मा में स्वयं पूर्ण श्रद्धा का उदाहरण उपस्थित करके सैकड़ों आत्माओं को टेढ़े और दुर्गम मागों से बचाया ? उसी
मुलतान आर्य समाज ने अपनी १२ अप्रैल, सन् १८८८ की अन्तरंग सभा के अधिवेशन में सम्ति दी कि स्वामी दयानन्द
के जीवन की घटनाएं एकत्रित करने के लिए पं० लेखराम को नियुक्त किया जाये।