साथ-साथ इसमें महर्षि के सैद्धान्तिक विचारों का भी यत तत्र उल्लेख किया है। अनेक विषयों
पर तो ऐसे उपदेश तथा व्याख्याएं इसमें मिलेंगी, जो महर्षि के अन्य ग्रन्थों में भी सलघ नहीं है। महर्षि के इस इव, पत्र
र आदर्श जीवन से पाठकों को आदर्श जीवन की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
महाष का यह जीवनचरित्र सर्वप्रधम सन् १८९७ में उर्दू भाषा में छपा वा। महा् के अन्य जीवनचरिया में प्रमुख
स्वामी सत्यानंद जी द्वारा लिखित श्रीमदयानन्दप्रकाश सन १९११ में तथा श्री देवेन्द्रनाथ द्वारासंकलित और पं०घासीराम
जी द्वारा सम्पादित जीवनचरित्र सन् १९३३ में प्रकाशित हुआ है जिसमे इसकी प्राचीनता स्पष्ट ही है। पण्डित जी ने इसका
मूलप्रति उर्दू भाषा में लिखी थी और उर्दू भाषा में ही इसका प्रथम प्रकाशन हुआ था। परन्तु अब यह कहीं-कहीं जाने-aन
अवस्था में पुस्तकालयों की ही शोभा बढ़ा रही थी। यह जीवनचरित्र बाजार में किसी कीमत पर भी नहीं मिलता था और
उर्दू भाषा में होने से नई पीढ़ी के व्यक्ति तो इसका लाभ उठा ही नहीं सकते थे।

ऐसे अमूल्य जीवनचरित्र का अभाव प्रत्येक महर्षि-भक्त को खटक रहा था। आर्यसमाज नयाबांस (दिल्ली) के
मान्य अधिकारियों ने इस समस्या को समझा और अपने समाज की बैठक में निर्णय किया कि अपनी समाज की स्वर्ण जयन्ती
समारोह के अवसर पर इसे छपवाया जाए परन्तु उर्दू भाषा में जनसाधारणका लाभ न देखकर इसके अनुवाद के लिए प्रयत्न
किया गया। सौभाग्यवश एक महर्षि-भक्त आर्य खोज करने पर मिल ही गए। श्री कविराज रघुनन्दन सिंह जी निरमल’ ने
इस कठिन कार्य को बड़े ही उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से किया । एतदर्थ वे बहुत ही धन्यवादार्ह हैं । अन्य का प्रकाशन हो गया ।
इसका आर्य जनता ने बहुत ही स्वागत किया और यह जीवनचरित्र कुछ ही वर्षों में समाप्त हो गया। इसकी लोकप्रियता
को देखकर आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट ने इसके पुन: प्रकाशन करने का निर्णय किया और आर्यसमाज नयाबांसके अधिकारियों
से स्वीकृति मांगी। हमें खुशी है कि समाज के अधिकारियों ने तुरन्त सहर्ष स्वीकृति दे दी। हम उनका हृदय से आभार
मानते हैं। श्री पं० विश्वदेव शास्त्री ने इस पर ग्रन्थ को पन: पढ़कर इसकी अशुद्धियों को शुद्ध किया, एतदर्थ उनका घन्यवाद
आवश्यक है। साथ ही इसके पूफसंशोधन के श्रम-साध्य कार्य में श्री कर्मवीर जी ने जो तन्मयता से कार्य किया है, उनका
भी धन्यवाद करते हैं। इस विशालकाय ग्रन्थ के प्रकाशन में कम्पोजीटर मिश्रादि ने जो हमें पूरा सहयोग दिया है, उसको
भी कैसे भुलाया जा सकता है।
पुस्तक का प्रकाशन बढ़िया कागज पर नया टाइप भरवा कर बहुत ही सुन्दर रूप में किया गया है। इसकी कीमत
भी प्रचारार्थ लागत से भी कम रक्खी है। हमें आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि प्राणिमात्र के परम हितैषी महर्षि
के जीवनचरित्र का पाठ हृदय से स्वागत करेंगे और इसके प्रचार में सहयोग देकर जहां हमारे उत्साह को बढ़ायेंगे वहां
ऋषि-जीवन से प्रेरणा पाकर अपनी जीवन-यात्रा को सुखद बनाकर पणय के भागी बनेंगे।

दीपचन्द आर्य
प्रधान, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट
एफ कमला नगर,