अपने विरुद्ध बोलने वाले को कैसे सहन कर सकते थे। गंगा के प्रबल प्रयास को मोड़ना अथवा समुद्री तृफानों से संघर्ष
करना तो आसान था, परन्तु धार्मिक क्षेत्र में बोलना तो खुला विद्रोह व अन्य अपराध था घन्य है उस महर्षि या महात्मा
को जिन्होंने अपने सभी सांसारिक तथा पारमार्थिक सुख पर लात मारकर परोपकार को ही सर्वस्व समझा और वे एक कौपीन
बांधकर केवल वेद की पुस्तक लेकर युद्धक्षेत्र में कूद पड़े और उन्होंने अपने ज्ञान, तप तथा सदाचार की भट्ठी में तप्त उज्ज्वल
कुन्दन की भांति अपने अद्भुत प्रभाव से विरोधियों को परास्त ही नहीं किया, प्रत्युत उन्हें नतमस्तक होकर वेट-धर्म मानने
को विवश भी किया। इसलिए महात्मा मुंशीराम ने महर्षि के जीवनचरित्र के विषय में ठीक ही कहा है कि “यह जीवनचरित्र’
ब्राह्मण धर्म में नया जीवन फूंकने की एक पूर्ण कहानी है।”
इस जीवन चरित्र की विशेषताएं-=

महर्षि दयानन्द के अब तक उपलब्ध एवं प्रकाशित जानवरों में अमर हुतात्मा पं० लेखराम जी द्वारा लिखित
जीवनचरित्र ही मूल ग्रन्थ सर्वाधिक प्रामाणिक तथा मान्य है महर्षि के सभी जीवन-चरित्र प्राय: इसकी सहायता से लिखे
गए है। यद्यपि महर्षि की जीवन संबंधी घटनाओं के संग्रह में अन्य भी अनेक व्यवितियों ने प्रशंसनीय परिश्रम किया है,
किन्तु सबसे अधिक घटनाएं पं लेखराम जी ने एकच की, जो कि इसमें विद्यमान हैं। बाबू देवेद्द्रनाथकृत
जीवन घटनाओं के संकलनकर्ता पं धासीराम जी द्वितीया वृत्ति की भूमिका में इस जीवनचरित्र की प्रशंसा एवब महत्व
स्पष्ट करते हुए लिखते हैं

“ऋषि के जीवन राव का कोई भी लेखक पं० लेखराम कृत जीवनचरित्र की सहायता के बिना एक पग भी आगे
नहीं रख सकता ।ल(पृ० २ ० १८)
इस जीवन चरित्र की परम विशेषता यह है कि इसमें पंडित जी ने भारत में स्वयं घूम-घूम कर महर्षि के प्रत्यक्षद्रष्टाओं
एवं श्रोता की खोज की और उन प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा सुनाई गई अथवा लिखकर दी गई घटनाओं का इसमें ज्यों का त्यों
वर्णन है जिससे पाठकों के हृदय में इसके प्रति अधिक आस्था एवं श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसमें किसी-किसी घटना का
वर्णन भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से प्राप्त होने से उनमें कुछ विभिन्नता भी आ गई है। परन्तु उनमें परिवर्तन न करके पण्डित जी
ने यथार्थरूप में ही लिख दिया । पाठक ऐसे स्थलों पर स्वयं न्यायाधीश के तुल्य निर्णय करने का प्रयास करने की कृपा
करेंगे। उनमें परिवर्तन करना पण्डित जी ने भी उचित नहीं समझा, क्योंकि उससे जीवनचरित्र का यथार्थ स्वरूप नहीं रह
पाता । नि:संदेह यह जीवनचरित्र महर्षि के जीवन वृत्तान्त को जानने के लिए विशाल कोष एवं विश्वसनीय है। ऋषि-भक्त
आर्य पथिक पं लेखराम जी ने बहुत उत्साह और श्रद्धा से स्थान-स्थान पर जाकर बड़ी योग्यता से जीवन की घटनाओं
का यह संग्रह किया है । महर्षि निर्वाण के तुरंत बाद ही पण्डित जी ने यह कार्य प्रारम्भ कर दिया था। अतएव उन्हें असलर प
में वे दलम लेख और वृत्तान्त प्राप्त हो सके जो कालान्तर में प्राप्त नहीं हो सकते थे। उस समय लोगों को महर्षि के जीवन
की दुर्घटना : स्मरण थी । पण्डित जी को महर्षि द्वारा स्वयं लिखित आत्मकथा की आर्य भाषा की मूल प्रति भी प्राप्त हो
गई थी, जिससे अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करा के थियोसोफिस्ट पत्रिका को भेजा गया था। पण्डित जी को पूना व्याख्यान
में कथित जीवन की उसी समय की महाराष्ट्र-भाषा में लिखी एक प्रति भी प्राप्त हुई । इन दोनों प्रतियों को मिलाकर पण्डित
जी ने महर्षि का स्वकथित जीवनवृत्त इस पुस्तक में समाविष्ट किया। पं० भगवद्दत जी ने भी इसी पुस्तक से लेकर महर्षि
का स्वकधित जीवनचरित्र लिखा । रब दयानन्द के पत्र और विज्ञापन’ ग्रन्थ में भी बहुत से अंश इस पुस्तक से लिये गए
हैं। महर्षि ने कितने ही शास्त्रार्थ किए किन्तु उनमें से ३-४ ही उपलब्ध होते थे। इस ग्रन्थ में महर्षि के बहुत से शास्ताध्थों का
सविस्तार कथन है । इस ग्रन्थ से लेकर ही दयानन्द शास्त्रार्थ-संग्रह’ ग्रन्थ का प्रकाशन हमारे ट्रस्ट ने किया है। जीवन की

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