आधुनिक युग की महान् विभूति, अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के धनी तथा इस योग के निर्माता महर्षि दयानन्द के
नाम से कौन भारतीय अपरिचित होगा। उन्होंने भारतवर्ष की धार्मिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय बुराइयों को दूर करने केसिए
जो अजेय शक्ति के प्रभाव से सुधारात्मक कार्य किये, उनको मानव-जाति यावच्चन्द्रदिवाकरी तक चिरस्मरण रखरखेगी।
उनका जनमानस पर ज्ञान व तप के अपूर्व प्रभाव के साथ-साथ सच्चरित्र का आदत प्रभाव था । उन्हीोंने जी चुछ जाना था
सुनने का सत्य की कसौटी पर परखा, इसीलिए उन का ज्ञान उच्चकोटि का तथा परमप्रभावोत्पादक यन सका था, जिसको
सुन-सुन कर उनके प्रबल धर्मो भी दांतों तले अंगली दबाते थे, और उनके प्रचल एवं प्रखर युक्ति-शरों से विट होकर
अवाक् तथा निरुत्तर हो जाते थे। जिनके दर्शन तथा ओजस्वी भाषणों को सन-सन कर पं० गुरदत जैसा नास्तिक आस्तिक।
तवा नास्तिक एवं भयंकर दुष्कर्मों के पंक में निमग्न मुंशीराम महात्मा (स्वामी श्रद्धानन्द) बन सकता है, तो क्या उस सच्चे
महात्मा का जीवन रित्र पद-भ्रष्ट लोगों को सा मार्गदर्शक, अज्ञानान्धकार में भले-भटकों को सूर्यसम प्रकाशक तबा कुकमी
के पास में दृढ़ता से जकड़ी ओं को पवित्र ज्ञान-सरस्वती में स्नान कराकर काया-पलट कराने वाला नहीं होगा ? भरगवान्
मनु ने सत्य ही कहा है

दातार दस मिला
। तच सदा मंगलम् ।।
सदाचार अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण वेदादि के तुल्य है जनसाधारण के लिए साक्षात् धर्म का लक्षण है।
महर्षि के जीवनचरित्र की विशेषताओं तथा महत्व को समझने के लिए तत्कालीन भारतवर्षीय अवस्था को समझना भी बहुत
आवश्यक है। १९वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने देश को परतंत्रता के पाश में जकड़ रखा है। अंग्रेज यहां की संस्कृति-सभ्यता
के मूल में कुठाराघात कर रहा था। भारतीय राजा पारस्परिक फुट और विद्वेषाग्नि से मृतप्राय हो गए थे। विधर्मियों द्वारा
आर्य धर्मावलंबियों को भेड़-बकरियों की भांति ईसा-मूसा की भेड़ों में बलात् या लोभाकृष्ट करके मिलाया जा रहा चा ।
आर्य धर्म के मठाधीशों के धोखे पाखण्डों से आर्य धर्म जीर्ण-शीर्ण हो गया था। आर्यों के इतिहास को अन्दर ही अन्दर बदला
जा रहा था। नौकरी का लोभ देकर विदेशी भाषा के चंगुल में फसाकर आर्यगाषाओं और विश्व जननी देववाणी का
खुलेआम तिरस्कार किया जा रहा था। दीन व दलितों को पादाक्रान्त करके उनके सभी धार्मिक अधिकार छीन लिये थे।
स्त्रियों को पैरों की जूती समझा जाने लगा था। स्त्रियों व शुद्रों को पढ़ने का कोई अधिकार नहीं वा । विघवाओं की दुखपूर्ण
आहों से देश झुलस गया था। ईश्वरोपासना के विषय में मतमतान्तरों के पारस्परिक झगड़ों से ईश्वर भी कलह का कारण
बन गया था। एक तरह से ईश्वर को भी कुक्षी भरी लोगों ने तुच्छ उदर-दरी को पूर्ण करने का साधन बना लिया था
धार्मिक राजनीतिक, सामाजिक दुर्दशा के साथ-साथ यहां की आर्थिक-दरिद्रता ने देश को बिलक्ल पंग बना दिया था
सोने-चांदी की खान हिन्दुस्तान दाने-दाने को मुहताज हो गया था। आर्थिकोन्नति में परम सहायक तथा उपयोगी गो-मात
की ग्रीवा पर मांसाहार के तुच्छ लाभ के लिए दिन दहाड़े कुठार चल रहा था। देश की ऐसी दयनीय दुर्दशा को देखक
कठोर पत्थर भी द्रवित हो जाता था। ऐसे समय में सुधार की बात सोचना भी अपराध था। मतमतान्तरों के पुशंस ठेकेद

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