घटनाओं के अन्देषण के लिए पं० सेक्सी योजनम खदित- पडित लेखराम आार्य पथिक उस रमय ‘अआर्थ-
कथा आयोतिनिधि सभा पंजाब ने अपनी अन्तरंग सभा के अधिवेशन में जो १ जुलाई, सन्
१८८८ की २ व पंडित लेखराम आर्य पिक को इस कार्य के लिए नियक्त करके मानो उन्ह सच
पद का अधिकारी बना दिया । पंजाब की आर्यसमाजों से पत््रह सौ रुपयों के लिये अपील की गई थो जो थोड़े समय में ही
नवम्बर १८८८ से पंडित लेखराम जी ने नियमपूर्वक कार्य करना प्रारम्भ कर दिया।

देरी का कारण अन्वेषक की विशेष परिस्थिति- इसमें संदेह नहीं
पंडित लेखराम आर्य जैसा अन्वेषक
लिए उपयुक्त था परन्तु मेरे विचार में यह पुस्तक पाठको के हाथ में और शवध पहुचती और कदाचित्
घटनाओं की दृष्टि से और अधिक पर्ण होती यतिघटनाओ को एकतित करने का कार्य किसी ऐसे अन्वेषक को दिया गया
होता जिस पर उपदेश देने का उत्तरदायित्व न होता । कौन नहीं जानता कि पंडित लेखराम को वैदिक(आयी) घर्म की ठन्नत
का विचार कभी भी एक स्थान पर बैठने नहीं देना शा और यद्धि उनदोंने कहीं सनलिया कि आमुक स्थान पर मोहम्मदी अखबा
पदरा विशेष सफलता प्राप्त कर रहे हैं तो फिर बड़े से बड़े और आवश्यक से आवश्यक कार्यों को छोड़कर
न पर पहुचना वह अपना कर्तव्य समझा करते थे। यही कारण था कि प्राय: विशेष वृतांत की खोज में क्रमश:
पुर मा धार्मिक शाखा को सूचना प्राप्त होते ही पंडित लेखराम कई आवश्यक स्थानों को बीच में छोड़ कर ही
लाट आया करते थे परन्तु आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब भी विवश थी। स्वामी दयानन्द का जीवन कोई साधारण जीवन न
उसका वृत्तांत केवल एक या दो स्थानों पर जाने से विदित हो जाता। इस जीवन का वृतांत जानने के लिए एक ऐसे
अन्वेषी स्वभाव के व्यक्ति की आवश्यकता थी जो जहां एक ओर निरन्तर यात्रा करता रहता तो दूसरी ऑर विदित हुए
वृत्त से ठीक निष्कर्ष निकालने की योग्यता रखता । ऐसा व्यक्ति पंडित लेखराम के अतिरिक्त उस समय दूसरा दिखाई
नहीं देता था। इसी कारण उन्हीं से काम लेना उचित समझा गया और जब घटनाओं के उस बहुमूल्य और प्रामाणिक संत्रह
को देख जाता है जो वे इकट्ठा कर गये हैं तो यही कहना पड़ता है कि निरन्तर प्रचार कार्य में संलग्न रहने और अपनी
बड़ी-बड़ी पुस्तकों के संशोधन और पूर्ति में व्यस्त रहने पर भी जो मसाला पंडित लेखराम ने इकट्ठा किया है, वह कदाचित्
ही कोई दूसरा व्यक्ति उस समय एकत्रित कर सकता । परन्तु फिर भी हम उन व्रटियों की उपेक्षा नहीं कर सकते जो कि इस
आवश्यक खोज के मार्ग में विशेष बाधाएं पड़ने के कारण प्रकट हुई है। यही कारण है कि बहुत से स्थानों के वृत्तांत पंडित
लेखराम जी ने अन्य स्थानों के निवासियों द्वारा प्राप्त करके लिखे हैं और उस स्थान-विशेष पर कई बार जाने पर भी वे उस
स्थान पर बैठकर खोज न कर सके 1

जीवनचरित्र की खोज में ये जो बाधाएं पड़ती रही इनको दूर करने की आवश्यकता आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब
समय-समय पर अनुभव करती रही और इसलिए विशेष नियम निश्चित करके पंडित लेखराम जी की सेवा में भेजे गये
परन्तु पंडित लेखराम जी के धार्मिक उत्साह को शान्त करने के लिए कोई भी नियम सफल नहीं हो सकता था। उनको
बनाने के लिए एक आर्य समाज का यह सूचना दे देना ही पर्याप्त था कि एक व्यक्ति मुसलमान होने वाला है अथवा किसी
मोहम्मदी उपदेशक या मौलवी से शास्त्रार्थ की संभावना है। इस पर यदि आर्यप्रतिनिधि सभा की ओर से आक्षेप होता तो
पंडित जी का इतना उत्तर ही सभा को मौन करने के लिए पर्याप्त रहता था कि वह उन दिनों का जो ऐसे शास्त्रार्थों में लगे हैं
वेतन न लेंगे। सन् १८९२ के अन्त तक पंडित जी ने बहुत कुछ कार्य कर लिया था इसलिए उनको एकत्रित वृत्तांत को
उचित क्रम देने के लिए बुला लिया गया। कुछ समय तक पंडित जी मेरे पास रहकर समस्त वृत्तांत को नये सिरे से शुद्ध
करके लिखते रहे परन्तु आर्य-प्रतिनिधि सभा पंजाब को उस समय उपदेशकों की अत्यन्त आवश्यकता थी धर्म की प्यास
लोगों में बहुत अधिक भड़क उठी थी और प्रत्येक स्थान पर पंडित लेखराम के धार्मिक ज्ञान के लाभ उठाने की इच्छा जाग