मनुष्यकृत प्रतीत होते ही पंचदशी बांचना बन्द कर दिया-इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत होने पर लोग एकत्रित
होने लगे। उनमें से एक-दो वेदान्ती थे। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि आप घंटे दो घंटे तक यदि कछ अपने मुखारविन्द से
कहा कर तो समय अच्छा व्यतीत होगा। स्वामी जी ने कहा जैसी इच्छा। इस पर उन लोगों ने सम्मति करके यह बात कही
कि ‘पंचदशी’ वेदान्त का ग्रन्थ है, प्रायः संन्यासियों का उसी में पठन-पाठन रहता है। उसमें ही से यदि आप कुछ कहा कर
तो सब लोग सुनने के जिज्ञासु है। इसलिए अगले दिन ‘पंचदशी’ की पुस्तक मंगाई गई और स्वामी जी ने उसका पाठ
आरम्भ करने से पूर्व यह बात उनसे कह दी कि मैं ऋषिकृत ग्रन्थ बांचता और मानता हूं । जो ग्रन्थ मनुष्यकृत होगा में नहीं
बांचूगा। लोगों ने कहा कि महाराज ! यह तो मनुष्यकृत नहीं दीखता । शंकर स्वामी के शिष्य विद्यारण्य स्वामी का बनाया
हुआ है और वे बड़े महात्मा थे। स्वामी जी ने कहा कि अच्छा, और कथा का आरम्भ किया। जहां बैठे हुए थे वहां से ही
साधारण रोति से सुनने लगे। लोगों ने एक चौकी आगे रख दी और उस पर उनको बिठलाया। स्वामी जी ने प्रथम थोड़ा
सा बच्चा और उसका अर्थ क्या। पढ़ते-पढ़ते उसमें एक स्थल ऐसा निकला कि कभी-कभी ईश्वर को भी भ्रम हो जाता
है। स्वामी जी ने उस पर स्वयं ही आक्षेप किया कि यह कैसी बात है ! जिसको भ्रम हुआ वह ईश्वर कहां रहा? ईश्वर को
कभी भ्रम हुआ ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि यह ग्रन्थ मनुष्यकृत है । यह कहकर पुस्तक के पन्ने हाथ से रख दिये । ‘हरि
ओम् तत्सत् कहकर कि अब मैं इसको नहीं बोलूंगा, गुरु की आज्ञा नहीं। लोगों ने बहुत हठ किया परन्तु उन्होंने किसी
का कहना न मानने और न वह पुस्तक हाथ में ली।

परन्तु क्वार के महीने से गीता की कथा आरम्भ की। रात के समय दो घंटे यह कथा किया करते थे और देवी
भागवत’ * से भी अच्छे-अच्छे उपदेश सुनाया करते थे। यह कथा दीपावली पश्चात् एक मास तक होती रही।

मेरी धोती और न्यौली क्रिया की स्वास्थ्य के लिए शिक्षा–अष्टाध्यायी के दोनों विद्यार्थी कभी-कभी वहां ही
रह जाते थे। रह जाने का कारण यह था कि सुन्दरलाल जी को उन दिनों मस्तिष्क का रोग था अर्थात् सुगन्ध-दुर्गन्ध नहीं
आती थी। स्वामी जी ने उसको नेति, धोति और न्यौली कर्म सिखाये और जब वे स्नान कर चुकते थो तो यह घर चले आते
थे जिससे वह फिर स्वस्थ हो गये। इनके अतिरिक्त मुंशी ब्रजलाल, मुंशी श्रीकृष्ण और मंशी हरप्रसाद जो नवाब के नाम
से विख्यात थे, इन माथुर कायस्थों आदि ने स्वामी जी से योग का विषय सीखा और पूछा । स्वामी जी ने उनको वस्ति और
नेति ये योग की दो क्रियाएं बतलाई थीं। न्यौली कर्म उनसे नहीं हो सका । ध्यान करना भी बतलाया था और कुछ सूत्र
पातंजल योग के बतलाये थे।

न्यौली क्रिया से उदर विकार की निवृत्ति, स्वास्थ्य के लिये योग क्रियाओं का प्रयोग-एक दिन वहां स्वामी
जी के पांव पर कुछ फुंसियां निकली जिनको वह अपनी बोली में परकी कहते थे । कहने लगे कि अब उदर में विकार हो
गया, चलो न्यौली क्रिया करें । तीन चार मनुष्यों को साथ लेकर राजघाट यमुनातट पर जाकर जल में बैठ मुलद्वार से तीन
बार जल चढ़ाया और निकाल दिया। प्रथम बार दुर्गन्धि सहित, और दूसरी बार पीला और तीसरी बार केवल श्वेत जल
निकला और उदर पूर्णतया शुद्ध हो गया। जल चढ़ाने के पश्चात् नाभि-चक्र को घुमाते थे और नदी से बाहर निकल कर
जल फेक देते थे। अन्त में जब देखा कि मैल नहीं रही तब स्नान करके घर को चल दिये । उस दिन बहुत दुर्बल हो गये थे
क्योंकि यह क्रिया विरेचन के तुल्य है । घर पर आकर दाल-भात खाया। कहते थे कि यह क्रिया हमने एक कनफटे जोगी
से विन्ध्याचल पर नर्मदा के तट पर बड़े परिश्रम से बहुत काल तक उसके पास रहकर सीखी थी।

प्रथम रचना, ‘सन्ध्या-पुस्तक’ का वितरण उन्हीं दिनों स्वामी जी के उपदेश से एक संध्या पतकर जिसके
अन्त में लक्ष्मी सूक्त था छपवाई गई और एक आने में बेची गई। समस्त नगर के लोगों ने बिना किसी पक्षपात के उन