या। पंडितों ने आक्षेप किया, यह क्रोध में आ गये और उसकी सिद्धि के लिए यह द्टा प्रन्ब बनाया और मिथ्या अभिमा
में आकर इस अशुद्ध को शुद्ध कर दिखाया, परन्तु इस व्यर्थ प्रयत्न करने पर भी ‘पर’ शुद्ध हुआ शुद्ध ही रहा।
जी ने उस समय यह भी कहा था कि हम संन्यासी को विदा नहीं पाते योकि तुम भोजन करां से ताओगे और किस
प्रकार धैर्य पूर्वक पढ़ोगे, परन्तु स्वामी जी ने बहुत अनुरोध किया। तीन-चार दिन उनके पास जाते रहे और उनकी सब बाटे
को स्वीकार किया।

भट्टोजि दीक्षित, जो सिद्धांत कौमुदी संस्कृत-व्याकरण के रचयिता उनके नाम पर दटी जी विपद में
लगवाया करते थे और जब तक उनका सम्मान विद्यार्थियों के हदय से दए नहीं होता था तब तक अष्टधायी शराब
नहीं कराते थे। यह बात उनकी जगत् प्रसिद्ध थी और विशेष रूप से समस्त विद्वानों को विदित दी । स्वामी दयने भी
इस आज्ञा का पालन किया, तब दंडी जी ने विद्या आरम्भ कराई । समस्त नगर में उगाही करता कर के गाने मराज
की पुस्तक मंगवायी गई जिस पर ३१ रुपए व्यय हुआ था।

के
अध्ययन काल में अग्नि परीक्षा के अवसर, एकनिष्ठ गुरु भक्ति ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन-यर
मथुरा में आने के कुछ माह पश्चात् अकाल पड़ा, जो छ सात मास तकरहा ।’ समस्त नगरनिवासियों के लिये साजरा
और विद्यार्थियों के लिये विशेषण अत्यन्त कठिनाई यह समस्त कष्टों का सामना करते और कठिनाइयों को सटने
हुए धेर्यूर्वक विद्याप्राप्ति में लगे रहे । दुर्गा खत्री, जो डाका वाले के नाम से विख्यात वा-उसके यरों की मछे से और
कभी चने की रोटी खाकर निर्वाह करते रहे।
दुर्भिक्ष के अन्त में मथुरा के प्रख्यात रईस बाबा अमर लाल जोशी से जो जाति के औदीच्य ब्राह्मण दे उर दिन
इनकी भेंट हो गई। वह इनसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए। तवसे उनके यहां भोजन करने लगे और जब तक मवरा में रहे
उन्हीं के यहां भोजन पाते हैं । उनके यहां प्रतिदिन सौ सवा सौ ब्राह्मणों को भोजन मिलता था। लाला गोरधन सर
वैश्य उनको चार आने मासिक तैल के लिये देता था, जिससे वह रात को पढ़ने के लिये दीपक जलाते और अपनी सस
(अपना पाठ) स्मरण करते रहे, और हरदेव पत्थर वाला लगभग २ रु० मासिक दूध के लिये देता था। आर्यावर्त के मन
नगरों मे मथुरा जैसा शुद्ध दूध कहीं नहीं मिला। अभी तक वहां दूध में पानी कदापि नहीं मिलाया जाता और विदर
होता है। यही कारण है कि मथुरा के पेड़े सारे भारत में अनुषम हैं।

दयानन्द जी) स्वामी विरजानन्द जी के स्नान के लिये १५ २० घड़े जल यमुना से प्रतिदिन ते थे उस बड़े
पुरुषार्थी, फर्ले और उद्यमी थे । मन्दिर की बैठक पर प्रतिदिन व्यायाम करते और कई मील ठक प्रमण करने जब कते
थे। दंडी जी के पीने के लिये अत्यन्त श्रेष्ठ शुद्ध जल यमुना के बीच में से जाकर लाया करते थे।

यदि कोई मनुष्य कभी इस प्रकार की कोई बात करता तो यह उसको दुत्शर दिया करते हे वारण कि इस विशय को बाड़े
से उन्हें हार्दिक घृणा थी । स्वामी दयानन्द कभी-कभी मथुरा में अघक फूकते और पारे की गोली मी बाचा करते थे । बड़रद
का छात्रों को उपदेश करते और स्वयं भी पूरे यति (संयमी पुरुष) थे। कई बार छात्रावस्था में होदी से निकाले गये और
कई बार फिर आये। उन्हीं दिनों वृन्दावन में रंगाचा से स्वामी विरजानन्द जी का शास्त्रार्थ र दयानन्दी भी साप
गये थे। वार्तालाप के समय वहां रंगाचार्य का एक शिष्य संस्कृत में बोलने लगा। दयानन्द ने उसकी बोली र
का संस्कृत में खंडन किया परन्तु दंडी जी ने रोक दिया कि तुम मत बोलो, चाहे वह कुछ कहे । एक दिन विदशेने