हमारे द्वारा अन्वेषित श्री स्वामी जी का जीवनवृत्त

अध्याय १
गंगातट पर सात वर्ष का जीवन

(संवत् १९१७ से सं० १९२३ तक)
मथुरा में स्वामी विरजानन्द जी से अध्ययन

(संवत् १९१७ से चैत्र सं० १९२० तक)
नर्मदा तट से मथुरा में स्वामी जी नर्मदा की यात्रा कर रहे थे कि उन्हें समाचार मिला कि मथुरा में एक प्रज्ञाचछ
दण्डी स्वामी व्याकरण के धुरंधर विद्वान् रहते हैं। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि जिस प्रकार भी हो उनसे पूर्ण विद्या क
अध्ययन करना चाहिये । विद्याप्राप्ति की इच्छा से रीवा बुंदेलखंड से होते हुए कार्तिक सुदी २ संवत् १९१७’ तदनुसार
बुधवार ४ नवम्बर सन् १८६० यम द्वितीया के दिन मथुरा में आये । प्रथम कुञा के कए पर ठहरे; फिर लद्मीनारावण के
मन्दिर में जा रहे। उस समय रुद्राक्ष की माला पहनते, भस्म लगाते और संन्यासियों की भांति कौपीन बांधते, अचरा छाती
पर रखते, सिर पर मंडासा बांधते और एक बहुत बड़ी लाठी हाथ में रखते थे। एक पुस्तक पास थी और यात्रा की कठिनाइयों
के कारण शरीर निर्बल हो रहा था । बोलने में गुजराती भाषा के शब्द–‘हमरे तुमरे का बहुत प्रयोग करते थे।

गुरु के द्वार पर जब दंडी जी के मकान पर आये तो किवाड़ भीतर से बन्द थे; नीचे से आवाज दी।
विरजानन्द जी-कौन है ? दयानन्द जी-एक संन्यासी ।
विरजानन्द जी क्या नाम है ? दयानन्द जी-दयानन्द सरस्वती ।
विरजानन्द जी—कुछ व्याकरण पढ़ा है? दयानन्द जी-सारस्वतादि पढ़ा है।

गुरु का प्रथम आदेश: मनुष्यकृत छोड़ो-दंडी जी ने द्वार खोल दिया, भीतर गये । प्रथम थोड़ी परीक्षा ली फिर
कहा कि ऋषि कृत शास्त्र और है। दयानन्द ने कहा कि महाराज हमें बतलाओ । विरजानन्द जी बोले कि मनुष्यकृत को छोडे-
तब इसको ले सकता है । दयानन्द ने संकल्प डाल दिया कि मैंने वह सब छोड़ दिये।’

सारस्वत का कच्चा चिट्ठा-तब विरजानन्द जी ने उनको सारस्वत की वास्तविकता सुनायी कि अनुभूतिस्वरूप
आचार्य ने इसे बनाया है। किसी शास्त्रार्थ में बूढ़ा होने के कारण मुख में दांत न रहने से पंस’शब्द अशुद्ध मुख से निकल

| ये सारी बातें पंडित जुगलकिशोर पुत्र,वसुदेव, गौड़ ब्राह्मण, दामोदर जी चौबे, पंडित हरिकृष्ण जी व पंडित गंगादत्त जो जो
स्वामी जी के सहाध्यायी थे ला० नैनसुख जी इडिया व रामचन्द्र पुजारी मंदिर लक्ष्मीनारायण स्थित मधुरा जहां स्वामी जी (अपने) रिष्ा को
अवस्था में रहते थे और उसे प्रतिदिन (ठनका) व्यवहार रहता था के मुंह से सुनकर लिखी गई हैं,मास दिसम्बर सन् १८८८।
काशी में चार बार आह्वान्, वेदों में मूर्तिपूजा मिला हो तो लावें-कोईव्लर नहीं निलसिंह १९९गित।

वर्ष के भाद्रपद में में काशी में था और आज तक चार बार ‘ मैं काशी में गया और जिस-जिस सन्द जाता हैं
किसी को वेदों में मूर्तिपूजा मिला हो तो लावे, ऐसा नोटिस देता हूं पर्दु आजट बोई ददन नहीं निकल सके।
प्रकार उत्तर भारत के सारे भागों में मैंने प्रेम किया है। आज दो वर्ष से कलकत्ता लढन इवटन, उदट
आदि स्थानों में घुमा पदेश मैंने बहुत से लोगों को किया और पठ्र्खाबाद काशी दि स्दानों में बंद मिठाने के
लिये तीन या चार पाठशालाएं स्थापित की। उनके पढ़ाने वालों की धूर्तता के कारण जितना लाभ होना चाहिये दैनन
हुआ। पिछले वर्ष में बम्बई आया और बम्बई में गुसांई जी महाराज के पक्ष वाढंडन बहुत प्रवार से किया और
बम्बई में आर्यसमाज को स्थापना की।

(संवत् १९३१ वि०-बम्बई से अहमदाबाद राजकोट में कुछ दिन जाकर धर्मोपदेश किया और इझदिने दुई
इस नगर पूना में लगभग दो मास हुए कि आया है। इस समय अद्थाद् ४ अगस्त सन् १८७५ से मेरी आयु ४९ या ५०
वर्ष की होगी। इस प्रकार मेरा पूर्व का चखि है।आर्य धर्म की उन्ति हो सके इसके लिये मेरे सदृश बहुत से धरमोपदेशक
अपने इस देश में उत्पन्न होने चाहिये अकेले के हाथ से यह काम ठीक नहीं होता है तथा अपनी बुद्धि और सामर्य के
अनुकूल मैंने जो दीक्षा ली है, उसे चलाऊंगा ऐसा संकल्प किया हुआ है । आर्यसमाज की सर्वत्र स्थापना होकर मूर्तिपूजादिङ
दष्टाचार सब स्थानों पर न हों, वेद और शास्त्र का सच्चा अर्थ प्रकट हो और उस के अनुकूल आचरण होकर देश की उन्नति
हो, ऐसी ही ईश्वर से प्रार्थना है । तुम्हारी सबकी सहायता से अन्त:करणपूर्वक मेरी यह प्रार्थना सिद्ध होगी ऐसी
पूर्ण आशा है ।