उनको लाठी से मारा जिससे देडी जी वा हाथ दर्द करने लगा, तब दयानन्द जी ने कहा कि महाराज ! आप मुझे न मारा
कर क्योंकि मेरा शरीर वज्र के समान कठोर है, उस पर प्रहार करने से आपके कोमल हाथों को दख होगा । टस चोट का
चिह स्वामी जी के हाथ पर अन्तकाल तक रहा जिसे देख कर प्रायः महाराज देही जी का मरण किया करते थे
और उनकी विद्या और उपकार का हृदय से धन्यवाद करते थे और कहते थे कि ऐसे-ऐसे कष्ट उठा कर हमने संस्कृत विद्या
को ग्रहण किया है।
फिर एक बार संता* लेते समय पढ़ाते हुए वृद्ध होकर दयानन्द जी को गालियां दी और एक सोटा मारा । प्रयनसख
जहिया ने दडी जी से कहा कि यह कोई हमारी भांति गृहस्थी नहीं है, साधु संन्यासी हैं। इनको न तो गाली देनी चाहिये और
न मारना चाहिये । विरजानन्द जी ने कहा कि अच्छा हम भविष्य में प्रतिष्ठापुर्वक पढ़ायेंगे । जब पाठ समाप्त करके दयानन्द
जो उस शाला से बाहर आये तो नयनसुख जी पर क्रुद्ध हुए कि तुमने मेरा इस प्रकार पक्ष क्यों लिया, दंडी जी तो सुधारने
के लिये मारते हैं, शत्रुता अथवा हठ से नहीं जैसे कुम्हार ताड़-ताड़ कर घट को बनाता है। यह तो उनकी कृपा है, आपने
बहुत बुरा किया जो उनको ऐसा करने से रोका।
| योगाभ्यास, शालचर्चा, उपदेश–स्वामी जी यहां विश्रान्त घाट पर लक्ष्मीनारायण के मन्दिर में रहते थे। अवयश
के समय योगाभ्यास भी किया करते थे और सहपाठियों के साथ व्याकरण सम्बन्धी विचार भी। उन्हीं दिनों बाह्मणों को
सन्ध्या, उपासना और अग्निहोत्र का उपदेश देते और थोड़ा-थोड़ा सम्प्रदायों का खंडन भी किया करते थे। पंडित जुगल
किशोर जी कहते हैं कि एक दिन विद्यार्थी-अवस्था में हम से स्पष्ट कह दिया कि मूर्तिपूजा, कंठी, तिलक छाप आदि सब
निषिद्ध हैं परन्तु उस समय खंडन-मंडन खुले रूप में नहीं करते थे। उनके कारण मन्दिर में बहुत विद्यार्थी जाया करते दे
और रात के ११-१२ बजे तक विद्या पढ़ते रहते थे। स्वामी जी सायंकाल को मन्दिर में बैठकर संस्कृत बोलते और पंडित
से विभिन्न विषयों पर शास्त्रार्थ किया करते थे।

जब उनके यहां से चले जाने और विद्यासमाप्ति के पन्द्रह बीस दिन रह गये तो एक दिन विरजानन्द जी ने कहा
कि दयानन्द !ऊपर जहां बैठते हैं झाडू दे देना। दयानन्द जी ने बुहारी देकर कूड़ा एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया । टहलने
के समय दंडी स्वामी जी का पांव उस कूड़े में पड़ गया जिस पर क्रुद्ध होकर गालियां दी कि तने हमारी आजा नहीं मानी
और साथ ही मकान से निकल जाने का आदेश दिया अर्थात् अपने शब्दों में ‘इयोढ़ी बन्द कर दी। इस पर स्वामी दयानन्द
परम दुखित हुए। पहले नन्दन चौबे से फिर नयनसुख से सिफारिश कराई। इन दोनों से स्वामी दयानन्द ने यह घी कह
दिया कि यद्यपि वह हृदय से श्राद्ध नहीं होते परन्तु अब मेरी विद्यासमाप्ति के दिन शीघ्र ही परे होने वाले हैंमहाराज को ऐसे
समय पर किसी प्रकार भी दु:खो करना योग्य नहीं । इसलिए उन दोनों की सिफारिश से दंडी जी का क्रोध-शांत गया।
दयानन्द जी ने उनके चरणों को स्पर्श किया और क्षमा मांगी। वहां क्या देर थी, करोध निवृत हो गया।

आदर्श गुरु-शिष्य और आदर्श गुरु-दक्षिणा
गुरु-दक्षिणा के सप में देश के लिये जीवन अर्पित कर दो’ गुरु विरजानन्द जी की निराली योग शिष्य हारा
विनय यूर्यक स्वीकृति-इस घटना के थोड़े दिन पश्चात् विद्या समाप्त की और आधा सेर लौग जो दंडी जी को अत्यंत दिय
देने को भेंट किये और जाने की आज्ञा मांगी। विरजानन्द जी मनुष्य के बड़े पारखी थे। तोन वर्ष के समय में उन्होंने
दयानन्द और के व्याकरण के शायरी और महाभाष्य और वेदान्त और इनसे अतिरिक्त भी जोकण विशेष
राम दा गाँव उ