टा सुविचार दा कि हमारे शिष्यों में से हमारे यमो यदि कुछरेगा तो दयानन्द हो करेगा। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न
होकर विद्यासमाप्ति की सफलता की गुरु दक्षिणा मांगी दयानन्द ने निवेदन किया कि जो आपको आज्ञा हो में उपस्थित
हू।दब दंडी जी ने कहा कि (१) देश का उपकार करो (२) सत्य शास्त्रों या उद्धार करो (३) मतमतान्तरों को अविद्या को
मिटाओ और (४)वैदिक धर्म प्रचार रो। स्वामी जी ने अत्यधिक क्षमा प्रार्थना करते हुए और बहुत विनय पूर्वक इसको
स्वायर किया और वहां से विदा हो गये। गुरु जी ने आशीर्वाद दिया और चलते हुए एक अमूल्य बात और भी कह दी
कि मनुष्दतृत पन्ों में परमेश्वर और ऋषियों की निन्दा है और अधिकृत में नहीं, इस कसौटी को हाथ से न छोड़ना।
मथुरा के विद्वानों की सर्वसम्मत राय: स्वामी दयानंद झूठ कभी नहीं बोलते थे-मशुरा के समस्त विद्वान्
पंडित इस विषय में सहमत हैं कि दंडोजो और स्वामी दयानन्द झूठ कभी नबोतते थे । सच्चे मनुष्यों के मित्र और सत्यप्रिय
दे झठे मनुष्यों के पास तक न फटकने देते थे।

स्वामी जी ने स्वयं भी शिक्षा प्रणाली के विषय में इस प्रकार वर्णन किया है

‘अर्थात जो बुद्धिमान पुरुषार्थी, निष्कपटी विद्यावृद्धि के चाहने वाले नित्य पढ़े-पढ़ावें तो डेढ़ वर्ष में अष्टाध्यायी
और डेढ़ वर्ष में महाभाष्य पढ़ के तीन वर्ष में पूर्ण वैयाकरण होकर वैदिक और लौकिक शब्दों का व्याकरण से बोध कर
पुन अन्य शास्त्रों में शीत्र सहज में पढ़-पढ़ सकते हैं। किन्तु जैसा बड़ा परिश्रमव्याकरण में होता है वैसा श्रम अन्य शास्त्रों
में करना नहीं पड़ता और जितना बोध इनके पढ़ने से तीन वर्षों में होता है उतना बोध कप्न्थ अर्थात् सारस्वत, चन्द्रिका,
औमदी मनोरमा आदि के पढ़ने से पचास वर्षों में भी नहीं हो सकता। क्योंकि जो महाशय ऋषियों ने सहजता से महान्
विषय अपने ब्रन्दों में प्रकाशित किया है वैसा इन क्षुद्राशय मनुष्यों के कल्पित ब्रन्दों में क्योंकर हो सकता है। महर्षि लोगों
का आशय जहां तक हो सके वहां तक सुगम और जिसके ग्रहण में समय थोड़ा लगे इस प्रकार का होता है और क्षुद्राशय
लोगों की मनसा ऐसी होती है कि जहां तक बने वहां तक कठिन रचना करनी जिसको बड़े-बड़े परिश्रम से पढ़ के अल्प
लाभ उठा सकें जैसे पहाड़ खोदना कीड़ी काताभ होना । और आर्ष ग्रन्थों का पढ़ना ऐसा है कि जैसा एक गोता लगाना
बहुमूल्य मोतियों का पानी। (सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास ३. पृष्ठ ६८)
स्वामी जी के पास एक गीता और विष्णु सहस्र नाम की पुस्तक थी वह मन्दिर लद्मीनारायण के पुजारी को दे दी।
स्वामी जी वैशाख मास के अन्त में संवत् १९२० तदनुसार अप्रैल सन् १८६३ में दो वर्ष ६ मास तक मथुरा में शिक्षा पाने
के पश्चात् आगरे की ओर पधार गये। चूंकि गर्मी हो गई थी, इसलिये अपना लिहाफ भी वहां मथुरा के मन्दिर में छोड़
गये । मन्दिर लक्ष्मी नारायण का दूसरा पुजारी घासीराम स्वामी जी के साथ आगरे गया था।

नोट-यहूदी और स्वामी जी के सत्संग सफत कितने सूत्र जो संस्कृत का अक्षर लिखना भी नहीं जानता-अष्टाध्यायी
के । और महाभाष्य की पंक्तियां उसे कंठस्थ हैं। केवल इतना ही नहीं प्रत्युत भागवत के खंडन के कई श्लोक भी उसने कंठ किये हुए।
हैं। इसका संस्कृत उच्चारण अत्यंत शुद्ध है जैसा कि कदाचित् विद्वान पंडितों का भी नहीं होता । वह संध्या करता है और संध्या के अर्थ
Fटमको कंठस्य जिससे लगभग समस्त मथुरा नगर में बीस तीस विद्वानो के अतिरिक्त और कोई परिचित नहीं:वह मथुरा निवासी होते
एमी मर्दिश में बना करता है। व्यवहार में स्पष्ट, निर्भीक और स्वतन्त्रता प्रिय है।।