आगरा में पहली शिष्य-मंडली: पं० सुन्दरलाल तथा बालमुकुन्द-मथुरा से आगरा पहुंचकर स्वामी जी यमना
के किनारे भैरव के मन्दिर के समीप ला गल्ला, पत्र रूपचन्द्र अग्रवाल के बगीचे में रहे । दस बारह दिन के पश्चात
घासीराम लौट गया और नी-दस मास पश्चात् फिर एक बार दर्शन के लिए आया । सत्यधर्म की ओर उसका ध्यान बहत
अधिक हो गया और मूर्ति पूजा से हार्दिक घृणा करने लगा था। कार्तिक संवत् १९२४ में इस घासीराम की मृत्यु हो गयी।
यदि वह जीवित रहता तो उससे बहुत वृत्तांत प्राप्त होता । इन दिनों उच्च न्यायालय (हाईकोट) भी आगरा में था । एक।
अनपढ़ साधु उस बगीचे में ठहरे हुए थे। उसने जाकर पंडित सुन्दर लाल जी, विद्याराम तथा वालमुकन्द-तीनों सज्जनों को
स्वामी जी के आने की सूचना दी। ये तीन सज्जन आगरा निवासी परस्पर मित्र, सनाढ्य ब्राह्मण और पोस्टमास्टर जनरल
के दफ्तर में नौकरी करते थे। इन तीनों ने जाकर स्वामी जी के दर्शन किये और फिर उसी प्रकार नित्य जाने लगे और
धर्म सम्बन्धी वार्तालाप करते रहे।
स्वामी कैलाश पर्वत जी द्वारा स्वामी जी के पाण्डित्य की सराहना–इन्हीं दिनों की बात है कि कैलाश पर्वत
स्वामी जो कि राजसी ठाठ-बाट से रहते और जिनकी हंडी भी चलती है, उसी बगीचे में आकर उतरे। उनकी राजसी ख्याति
के कारण बहुत लोग उनसे मिलने को गये। वहां गीता के एक श्लोक तथा वेदान्त विषय पर कुछ वाद हुआ । सम्भवत्
वह श्लोक ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य आदि था। स्वामी दयानन्द उन दिनों मथुरा से नये आये थे, उनको कोई न जानता था।
वे समीप के एक शिवालय में बैठे हुए थे। जब कैलाश पर्वत जी उस श्लोक के अर्थ से श्रोताओं को सन्तुष्ट न कर सके
तब रूपलाल के पुत्र ने स्वामी जी को सम्बोधित कर कहा कि आप कछ कह सकते हैं। तब स्वामी जी ने कहना प्रारम्भ
किया जिस पर सब सुनने वाले उनकी ओर आकृष्ट हो गये । सम्भवतः उस समय वहां पच्चीस-तीस मनुष्य थे । स्वामी जी
के अर्थ से उन सबको सन्तोष हो गया। उस समय कैलाश पर्वत जी ने कहा कि स्वामी जी की विद्या बहुत अच्छी है, यदि
तुम में से किसी को कुछ पढ़ना हो तो वह यही एक सशरीर (व्यक्ति) है जो कुछ पढ़ा सकते हैं। उस समय से पढने और
धर्म चर्चा में रुचि रखने वाले उनके पास आने लगे । कैलाश पर्वत जी दस दिन रहकर भरतपुर चले गये । कैलाश पर्वत जी
ने स्वयं भी इसको स्वीकार किया कि स्वामी जी उस समय साधारण साधुओं की भांति रहते थे और कृष्ण-भागवत का
खण्डन किया करते थे परन्तु महाभारत विचारा करते थे। अगले रविवार को पंडित सुन्दरलाल आदि चार उपस्थित व्यकवितयों
ने स्वामी जी से प्रश्न किया कि आपने जो इतनी विद्या पढ़ी है उससे आप क्या करेंगे और किसलिए आपने इतना परिश्रम
उठाया क्योंकि यह भाषा तो अब मृतभाषा (Dead Language) के तुल्य होती जाती है । न सरकारी दफ्तरों में और न कहीं
देश में इसकी पूछ है; इसका चलन छूटता जा रहा है। स्वामी जी ने उत्तर में कहा कि हम इससे अपना परलोक सुधारेंगे
और यदि किसी की इच्छा हो तो उसकी भी सहायता कर सकते हैं। इसी बात पर पंडित सुन्दरलाल जी और बालमुकुन्द ।
जी ने उनसे अष्टाध्यायी पढ़नी प्रारम्भ कर दी। यह सब लोग भाषा और इंगलिश जानते थे परन्तु अच्छी संस्कृत इनमें से
केवल पं बालमुकुन्द जी जानते थे । नौ दस बजे रात तक पढ़ाया करते थे

1.यह वृतंत पंडित बालमुकुन्द जी पैन्शनर प्रयाग निवासी, पंडित दयाराम जी कचहरी घाट आगरा निवासी,पंडित ज्वातादन
भार्गव आगरा निवासी, पंडित गोपालचन्द पिबौड़ी सनादय आगरा निवासी, सेकंड क्लर्क सुपरिण्टडैण्ट इन्जीनियर आफिस मेरठ या
स्वामी कैलाश पर्वत जी काशी निवासी से सुना ।