पार्वती को देखा। पार्वती महादेव जी से कह रही थी और उनकी बातों का विषय ें ही गा अर्थात् वह मेरे विषय में बातें ।
कर रहे थे। पार्वती महादेव जी से कह री भी कि अच्छा हो यदि दयानन्द सरसती का विवाह हो जाते परन्तु
बात से विरोध प्रकट कर रहा था। उसने मेरी भग की ओर संकेत किया अगत् भंग का प्रसंग छेड़ा। जब मैं जागा आर
इस स्वप्न का विचार किया तो मुझे बड़ा दु:ख और क्लेश हुआ। स समय अत्यन्त वर्षा हो रही थी और मैंने ठस बरामदे
में जो कि मन्दिर के बड़े द्वार के सम्मुख था–विश्राम किया । उस स्था पर साह अर्भात् नन्दी टेवता की मूर्ति सही है।
थी। अपने वस्ों और पुस्तक को उसकी पीठ पर रखकर मैं बैठ गया और अपनी बात को सोचने लगा। ज्यों हो अकस्मात
मैंने उस मूर्ति के भीतर की ओर दृष्टि डाली तो मुझके एक मनुष्य उसमें छुण हुआ दिखाई पड़ा। मैंने अपना हाथ उसका
ओर फैलाया जिससे वह बहुत हो गया क्योंकि मैंने देखा कि उसने झटपट छलांग मारी और छलंग मारते ही गांव की
और सरपट दौड़ गया। तब मैं उसके चले जाने पर उस मूर्ति के भीतर घुस गया और शेष रात वही सोता रहा । प्रातःकाल
एक वृद्धा सी वहां पर आई और उसने उस सांड देवता की पूजा की जिस अवस्था में कि मैं भी उसके भीतर ही बैठा हुआ
था। उसके थोड़े समय पश्चात् वह गड और दही लेकर लौटी और मेरी पूजा करके और मुझको भूल से देवता समझ कर
उसने कहा कि आप इसको स्वीकार कीजिये और कुछ इसमें से सेवन कीजिए। मैंने भूख होने के कारण उसको खा लिया।
दही चूकि बहुत खट्टा था इसलिये भंग का मद उतारने में अच्छी औषधि बन गया। उससे मद जाता रहा जिससे मुझको
बड़ा विश्राम मिला (आगे को भांग का सेवन बिल्कुल त्याग दिया) ।

योगियों की खोज में नर्मदा के स्रोत की और हाथियों की ओर से चेतावनी परन्तु अपने निश्चय पर
अटल-वेतन सुदी संवत् १९१४ वि०-अर्थात् २६ मार्च सन १८५७ बृहस्पतिवार को वहां से आगे चल पड़ा और उस
ओर प्रयाण किया जिधर पहाड़ियां थीं और जिधर नर्मदा नदी निकलती है अथत उद्रमस्यान की ओर चला (यह नर्मदा की
दूसरी यात्रा ची ) मैंने कभी एक बार भी किसी से मार्ग नहीं पूछा प्रत्युत दक्षिण की ओर यात्रा करता हुआ चला गया । शीघ्
ही में एक ऐसे सुनसान और निर्जन स्थान में पहुंच गया जहां चारों ओर बहत घने जंगल थे और वहां जंगल में अनियमित
अन्तर पर झाड़ियों के मध्य में बहुत से स्थानों पर क्रमरहित भग्न और सुनसान झोपडियां थीं और कहीं कहीं पृथक् पृथक्
ठीक झोपड़ियां भी दिखाई पड़ती थी । इन झोंपड़ियों में से एक झोपड़ी पर मैंने थोड़ा सा दूध पिया और फिर आगे की ओर
चल दिया परन्तु इससे आगे कोई डेढ़ मील के लगभग चलकर मैं फिर एक ऐसे स्थान पर पहुंचा जहां से कोई बड़ा मार्ग
दिखाई न देता था और मेरे लिये यही उचित प्रतीत होता था कि उन छोटे-छोटे मार्गों में से (जिनको मैं न जानता था कि
कहां जाते हैं) किसी एक को ग्रहण करू और उस ओर चल दें। शीघ्र ही मैं एक निर्जन और सुनसान जंगल में घुस गया ।1
उस जंगल में बहुत से बेरियों के वृक्ष थे परन्तु घास इतना घना और लंबा-लंबा उगा हुआ था कि मार्ग बिल्कुल दिखाई न
देता था। इस स्थान पर मेरा सामना एक बड़े काले रीख से हुआ। वह रीछ बड़ी तीव्र और भयानक आवाज से चीखा और
विधाड़ मार कर अपनी पिछली टांगों पर खड़ा होकर मुझे खाने के लिए अपना मुखा खोला । मैं कुछ समय तक निश्चेष्ट
खड़ा रहा परन्तु तत्पश्चात् मैंने शनैः शनैः अपने बेटे को उसकी ओर उठाया और वह रीछ उससे डर कर उल्टे पांव लौट
गया। उसकी चिंघाड़ और गर्ज इतने जोर की थी वह गांव वाले जो मुझको अभी मिले थे दर से उनका शब्द सुनकर और
लट्ठ लेकर शिकारी कुत्तों सहित मेरी सहायता करने के लिये उस स्थान पर आये। उन्होंने मुझको इस बात की प्रेरणा देने
कायल किया कि मैं उनके साथ चलूं। उन्होंने कहा कि यदि इस जंगल में तुम तनिक भी आगे बढ़ोगे तो बहुत सी विपत्तियों
का तुमको सामना करना पड़ेगा और पहाड़ियों व वनों में बहुत से भयंकर क्रोधी और जंगली पशु अर्थात् रीछ, हाथी और
शेर आदि तुम्हें मिलेंगे। मैंने उनसे निवेदन किया कि आप मेरे कुशलक्षेम की कोई चिन्ता न करें क्योंकि मैं सकुशल