सुरक्षित है। चूंकि मेरे मन में इस बात की चिन्ता थी कि किसी प्रकार नर्मदा के उद्गम स्थान को देख इसलिये यह समझ
भय और आशंकाएं मझको मेरे इस निश्चय से नहीं रोक सकती थी। जब उन्होंने देखा कि उनकी आशंकायत यों।
मन में कछ भय उत्पन्न नहीं करती और मैं अपने निश्चय में पक्का , तब उन्होंने मुझे एक सोटी दे दी जो कि मेरे सोटे से
बड़ी थी ताकि मैं उससे अपने को बचाऊ परन्तु मैंने उस सोटी को तुरन्त अपने हाथ से फेंक दिया ।

विकट वन में रेंग कर चलना तथा लहलहान-उस दिन मैं निरंतर तब तक यात्रा करता हुआ चला गया जन
तक संसार में चारों ओर अन्धकार न छा गया। कई घंटों तक मुझको मनुष्य की बस्ती का तनिक-भी किह न मिला और
कोई गांव मुझे दिखाई नहीं दिया और न किसी झोपड़ी पर ही दृष्टि पड़ी और न ही कोई मनुष्य जाति मेरी आंखों के सामने
आई परन्तु जो वस्तुएं साधारणतया मेरे मार्ग में आई, वे वह वृक्ष थे जो प्रायः टूटे हुए पड़े थे। जिनकी जड़ों को तवादे,
हाथियों ने तोड़कर और उड़ कर वहां फेंक दिया था। उसके थोड़ी ही दूर आगे बढ़ने पर मुझको एक बहुत ही बड़ा जंगल
दिखायी दिया कि जिसमें पसना भी कठिन था अर्थात इतने घने बेर आदि के कांटेदार वृक्ष वहा पर लगे हुए थे कि उनके
अन्दर से निकल कर जंगल और वन में पहुंचना बहुत कठिन ही नहीं प्रत्युत असम्भव दिखाई देता था। पहले पहल तो
मुझको उनके अंदर से निकलना असम्भव दिखाई दिया परन्तु तत्पश्चात् पेट के बल घुटनों के सहारे में शनै: शन: सर्प के
समान उन वृक्षों में से निकला और इस प्रकार उस रुकावट और कठिनाई को दूर किया और उस पर विजय प्राप्त की।
यद्यपि इस महान् विजय के प्राप्त करने में अपने वस्तों के टुकड़ों का बलिदान करना पड़ा और कुछ बलिदान मुझको
अपने शरीर के मांस का भी करना पड़ा जो उसके अन्दर से क्षत विक्षत होकर निकला। इस समय पूर्ण अन्धकार छाया हुआ।
था और अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता था। यद्यपि मार्ग बिल्कुल रुका हुआ था और दिखाई न पड़ता
था परन्तु तब भी मैं अपने आगे बढ़ने के निश्चय को छोड़ नहीं सकता था और इस आशा में था कि कोई मार्ग निकट ही
आयेगा । अतः मैं बराबर आगे को चलता ही गया और बढ़ता ही रहा यहां तक कि में एक ऐसे भयंकर स्वान में घुस गया
कि जहां चारों ओर ऊंची-ऊंची चट्टानें और ऐसी-ऐसी पहाड़ियां थीं कि जिनके ऊपर बहुत घनी वनस्पति और पादपादि
उगे हुए थे। परन्तु इतना अवश्य था कि बस्ती के वहां कछ-कछ चिह्न और लक्षण पाये जाते थे। शीघ्र ही मुझको कुछ
झोपड़ियां और कुछ कुटियाएं दिखाई पड़ी जिनके चारों ओर गोबर के ढेर लगे हुए थे और शुद्ध जल की एक छोटी नदी
के तट पर बहुत सी बकरियां भी चल रही थी और उन झोपड़ियों और टूटे-फूटे घरों के द्वारों और दराड़ों में से टिमटिमाता।
हुआ प्रकाश दिखाई पड़ता था जो चलते हुए यात्री को स्वागत और बधाई की आवाज लगाता प्रतीत होता था। मैंने वहां
एक बड़े वृक्ष के नीचे जो एक झोंपड़ी के ऊपर फैला हुआ था, रात व्यतीत की और प्रातःकाल उठकर मैं अपने घायल चरणों
और हाथ और छड़ी को नदी के पानी से धोकर अपनी उपासना तथा प्रार्थना करने के लिए बैठने को ही था कि इतने में ही
किसी जंगली जंतु के गरजने की-सी ध्वनि मेरे कान में आई । यह ध्वनि टमटम की ऊंची ध्वनि थी । थोड़े ही समय पश्चात्
मैंने एक बड़ी सवारी अथवा जुलूस आता हुआ देखा। उसमें बहुत से सी, पुरुष और बच्चे थे जिनके पीछे बहुत सी गौएं
और बकरियां थीं जो एक झोंपड़ी या घर से निकले थे। सम्भवतः यह किसी धार्मिक उत्सव की प्रथा परी करने के लिये
आये थे जो रात को हुआ करता है । जब उन्होंने मेरी ओर देखा और मुझको उस स्थान पर एक अपरिचित जाना तो बहुत
लोग मेरे चारों ओर इकट्ठा हो गये और अन्त में एक वृद्ध मनुष्य ने आगे बढ़कर मेरे से पूछा कि तुम कहां से आये हो? मैंने
उन सबसे कहा कि मैं बनारस से आया हूं और अब मैं नर्मदा नदी के उद्गमस्थान की ओर यात्रा के लिये जा रहा है। इतना
पूछकर वह सब मुझे अपनी उपासना में संलग्न छोड़कर चले गये। उनके जाने के आधा घंटा पश्चात् एक उनका सरदार
दो पहाड़ी मनुष्यों सहित मेरे पास आया और एक ओर पाश्र्व में बैठ गया। वह वास्तव में उन सबकी ओर से एक प्रतिनिधि
के रूप में मुझको अपनी झोंपड़ियों में बुलाने के लिये आया था परन्तु पूर्व की भांति मैंने अबके भी उनकी इस