| | ॥॥ ॥ ॥ १।५ ५५ ५ (एलिगे या ने तमके पजा के कार्ष में सम्मिलित होना पाप समझा।
|| ।।।। ।। ।।)। ।। ।।। ।।।।।।। पॉलिश करने की अ अपने मनुष्यों को दी और उसने दो
।।१।। । ।।।।।।।।।।।।। ५ ।। 1 करते हुए जाते हैं। अब मुझसे उसने मेरे खाने के विषय में पूछा और बताया
।।१५ ।। ।।।। ।( ५ ५ । पालु सरदार नाम से मेरा या मांगा और उसको लेकर अपनी पड़ी।
।। भर कर म पार भेज दिया । न उसमें से उस रात्रि घोड़ा सा दूध पिया। वह
। ॥ कर लौट आया। उस रात में भी गहरी निद्रा में सोया और सूर्योदय तक सोता
। ( उठकर पति गयो । नित होकर मै याग्ा के लिये तद्यत हुआ।*सारांश यह कि नर्मदा के
।। १।।टकर | शे पापा ५ में आया । न्भदा तट पर तीन वर्ष तक यात्रा की और भिन्न-भिन
५।।।।।।।।।।।।रा रहा।

तीन वर्ष से नदा-गण के पश्चात मथुरा में आगमन–(संवत् १९१७ वि०)-मथुरा में एक संन्यासी सत्पुरुष
।। १ ।।। ।। आनन्द स्वामी है। यह पहले अलवर में थे। उनकी आय ८१ वर्ष की थी।’ उनको वेद
शाखा राणा | rभो ॥ बहुत १धि थी। वे दोनों आखों से अन्थे थे और उनके उदर में सदा शूल का रोग रहता था।
उनको नि। दी, शेखरादि पन्थ अच्छे नहीं लगते थे। वह भागवतादि पुराणों का तो बहुत ही तिरस्कार करते थे।
॥ ॥ ॥ों पर उनकी बहुत ही भर दी। आगे जब उनका परिचय हुआ जब उनके तीन वर्ष में व्याकरण आता
है’ ॥ कहने पर मैंने उनके पास जाने का निश्चय किया।(संवत् १९१७ तदनुसार सन् १८६० मे) ।

मथुरा के अपर लाल जोशी को कभी न भूलूंगा-मथुरा में एक भद्रपुरुष अमरलाल’ नाम का था। उसने भी
जया (III या करता था, उस समय जो मेरे पर उपकार किये हैं उनको मैं कभी न भूलंगा । पुस्तकों की सामप्री, खाने-पीने
का प्रबंधन से कहत ही उत्तम मेरा कर दिया। उसे जब कहीं बाहर रोटी खाने को जाना होता तो प्रथम मुझको घर में बना
कर खिलाता फिर आप बाहर जाता। इसी प्रकार व पुरुष बहुत ही उदारचित्त था । संवत् १९१९ तक मथुरा में रहा अर्थात्
सन् १८६२ के अन्त तक

संवत १९२०-१९२१ वि० आगरा में विद्याध्ययन के समाप्त होने पर मैं आगरे में दो वर्ष रहा परन्तु समय-समय
पर पत्र द्वारा अथवा स्वयं मिलकर मैं स्वामी जी के पास से शंकाओं का समाधान कर लिया करता था। वहां से मैं ग्वालियर
गया और वहां थोड़ा-सा वैष्णव मत का खंडन करना प्रारम्भ किया। वहां से भी मथुरा में स्वामी जी को पत्र भेजता रहा था।
यहां ग्वालियर में एक माधयानु-मताचे य्य्य नामक पंडित था वह ‘ कारकृून (लेखक) का रूप बनाकर वाद आदि के सुनने
के लिए बैठता । किसी समय मेरे मुख से जब कोई अशुद्धि निकलती तो झट पकड़ लेता। मैंने बहुत बार पूछा कि आप
कौन हो परन्तु वह कहता कि ‘मैं तो साधारण कारकून (लेखक) हे, सुन-सुनकर परिचित हो गया हूं’ वह ऐसा कहता । एक
दिन ‘वैष्णव खड़ी रेखा लगाते हैं इस पर बातचीत चली तब मैंने कहा कि यदि खड़ी रेखा लगाने से स्वर्ग मिलता है तो
सारा मुख काला कर लेने से स्वर्ग के आगे भी कुछ मिलता होगा, ऐसा कहते ही उसे बहुत क्रोध आया और वह उठकर
पल दिया । तब मुझे खोज करने पर विदित हुआ कि यह अनुमताचार्य्य है । ग्वालियर से मैं करौली गया। वहां एक

कबीरपन्थी मिला । उसने एक बार उसका यह कबीर’ ऐसा अनुवाद किया था और कबीर उपनिषद् है ऐसा वह मुझसे
कहने लगा। वहां से आगे जयपुर को गया—वहां एक हरिश्चन्द्र विद्वान् पंडित था। वहां मैंने प्रथम वैष्णवमत का खंडन
करके शैव मत की स्थापना की। जयपुर के राजा महाराजा रामसिंह ने भी शैवमत को ग्रहण किया। इससे शैवमत का विस्तार