हुआ और सहस्रों रुद्राक्ष मालाएं मैंने अपने हाथ से दी । वहां शैवमत इतना पक्का हुआ कि हाथी, घोड़े आदि सबके गले
में भी रुद्राक्ष की मालाएं पड़ गई।
जयपुर से पुष्कर व अजमेर-जयपुर से मैं पुष्कर गया और वहां से अजमेर गया। अजमेर जाने पर शैकत का
भी खंडन करना आरम्भ कर दिया । यहां जयपुर के महाराजा ताट साहब से मिलने के लिये आगरे जाने वाले थे। वृन्दावन
में रंगाचार्य करके एक पंडित था । कहीं उससे शास्त्रार्थ न हो जाये इसलिये राजा रामसिंह जी ने मुझे बुलावा भेजा था । पै
जयपुर गया परन्तु मैंने शैव मत का भी खंडन करना प्रारम्भ कर दिया है यह समझते ही राजा जी को अप्रसन्नता हुई और है।
जयपुर छोड़कर निकल गया। फिर स्वामी जी के पास जाकर शंकाओं का समाधान कर लिया। वहां से फिर मैं हरिदार
गया (१२ अप्रैल सन् १८६७) ।

हरिद्वार के कुंभ में पाखण्ड खण्डन का आरम्भ
मतमतान्तरों का खण्डन तथा सर्वस्खल्याग-‘पाखण्डमर्दन’ ये अक्षर लिखकर ध्वजा मने अपने मठ पर लगाई।
वहां वाद-विवाद बहुत हुआ फिर मेरे मन को ऐसा प्रतीत होने लगा कि सारे संसार के विरुद्ध होकर और गृहस्थियों की
अपेक्षा भी बहुत-सी पुस्तकों आदि का खटराग रखकर क्या करना है, इस हेतु से मैंने सब छोड़ दिया और कौपीन लगाका
मौन धारण कर लिया।

तब से शरीर में जो राख लगानी प्रारम्भ की थी वह गतवर्ष बम्बई आने तक लगाता ही रहा था। रेल पर बैठने
के समय से लेकर वस्र पहनने लगा । हरिद्वार में जो मैंने मौन धारण किया वह बहुत दिन नहीं रहा क्योंकि बहुत लोग मूझे
पहचानते थे और एक दिन मेरी पर्णकुटी के द्वार पर किसी ने लिख दिया निगमकल्पतरोगलितं फलम् अर्थात् भागवत की
अपेक्षा बेद कुछ भी अधिक नहीं हैं प्रत्युत भागवत के पीछे हैं। तब मुझसे वह सहन नहीं हुआ और मौनवत छोड़कर मै
भागवत का खंडन करने लगा।

युक्त प्रान्त में शास्ार्थों की धूम काशी का प्रसिद्ध शास्त्रार्थ-संवत् १९२५ वि०) फिर ऐसा विचार किया।
ईश्वर कृपा से अपने को थोड़ा बहुत ज्ञान मिला है यह सब लोगों को कहना चाहिये। ऐसा निश्चय करके मैं फर्रुखाबाद
आया। वहां से मै रामगढ़िया रामगढ़ में वाद-विवाद आरम्भ किया। वहां जब दो चार शास्त्री एक साथ बोलने लगते
अब में ‘कोताही’ ऐसा कहता था। इसलिये आज तक वहां के लोग मुझे ‘कोलाहल स्य:मी २८ कहते हैं। वहां चक्रांकित
के दस आदमी मुझे मारने को आये परन्तु उनसे बड़े संकट से बचा। फरूखाबाद से मैं कानपुर आया और कानपुर से प्रयाग
गया । प्रयाग में मुझे मारने वाले मारने के लिये आये परन्तु एक माधवप्रसाद करके भद्रपुरुष था उसने मुझे बचाया। यह
माधवप्रसाद गृहस्थी मनुष्य ईसाई धर्म स्वीकार करने वाला था और उसने सारे पंडितों को नोटिस दिये थे कि अपने आर्य ।
धर्म के विषय में मेरा समाधान तीन महीने के भीतर करा दें अन्यथा समाधान न होने की अवस्था में मैं ईसाई धर्म स्वीकार
कर दूंगा। मैंने आर्य धर्म के विषय में उसका समाधान कर दिया और वह ईसाई होने से बच गया।
संवत् १९२६ वि०-प्रयाग से रामनगर गया। काशी में रामनगर के राजा के कहने पर काशी के पंडितों से
शास्त्रार्थ करने के लिए गया और उस वाद में प्रतिमा’ ऐसा शब्द वेदों में है या नहीं ऐसा विषय चला ।**वह शासा्थ और
स्वान पर छप कर प्रसिद्ध हुआ है-वह सब पढ़कर देखें । इतिहास से ब्राह्मण-ग्रन्थ ही ग्रहण करने चाहिये ऐसा भी वाद वहीं
चला था।

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