लिखा । द्वितीय अध्याय तक के प्रत्येक विषय का उतरदायित्व रखगीय पडित लेखराम जी पर है। यपि इस भाग में भी
बहुत कुछ उद्यम प० आत्माराम जी को करना पड़ा है और उन्होंने अपने पश्प्रम से भाग में बहुत कुछ शुद्धि की है तथापि
इस समस्त भाग को नियमित रूप पं० लेखराम जी ने दिया था और कि स्वर्गारी प० । साधारणतया पटनाएं उन्।
सज्जनों के शब्दों में लिखे हैं जिससे कि उनको विदित भई थी, इसलिए यह भाग कोमल स्वभाव व्यकितयोंको साधारणतया
अरुचिकर प्रतीत होगा परन्तु सत्यप्रिय व्यक्तियों को इस मिश्रण हीनता और सरलता में एक नगीन आनन्द प्राप्त होगा।
लेखक की योग्यता का प्रकाश इस पुस्तक को लिखने का प्रयोजन नहीं है। प्रत्युत सत्य-सत्य तृतंत बिना किस प्रकार की
काट-छाट के सर्वसाधारण जनता तक पहुंचाना अभीष्ट है। इसलिए भाषा सौदर्य की प्रेरणा से बचने में पति लेखराम ।
ने जनता का बड़ा उपकार किया है और कि उन्होंने प्रत्येक गन्नदार मनुष्य को एकत्रित घटनाओं से अपने लिए स्वतंत्र
निष्कर्ष निकालने का अवसर प्रदान किया है। इस पुस्तक के ततीय भाग अाय प्रग में स्वामी दयानन्द जी के गरु ।
(अलवर विरजानन्द सरस्वती) का संक्षिप्त जीवनचरित्र यद्यपि ला० आत्माराम जी ने अपनी भाषा में लिखा है तथापि उसका
मूल उन नोटा पर है जो कि पंडित लेखराम जी उस सम्बन्ध में छोड़ गये हैं। इससे आगे इस भाग के द्वितीय अण्याय से
समाप्ति पर्यन्त सारा विषय ला० आत्माराम जी की लेखनी से निकला हुआ है।

ला0 आत्माराम द्वारा लिखित अंश पर भूमिका-लेखक का मौन अन्तिम भाग के विषय में में अपनी कोई
सम्मति प्रकट करना नहीं चाहता क्योंकि भिन्न-भिन्न स्वभाव इससे भिन्-भिन्न प्रकार का प्रभाव ग्रहण करेंगे। हां ! इतना
लिखना आवश्यक समझता हूं कि वह भाग प्रत्येक पढ़ने वाले के लिए परे विचार और पो ध्यान का विषय है बर्यांकि में
उस भाग को भली-भांति समझ लेना ही इस पुस्तक के पढ़ने का फल समझता हूं।

घटना-संग्रह की त्रुटियां: पाठकों से निवेदन-मैं पहले ही प्रकट कर वका ह कि इस जीवनचरित्र की खोज और

इसका नियमित रूप देने में बहुत-सी त्रुटियां रह गई हैं और बहुत से युतांत विशेष बाधाओं के कारण अब तक जनता के
समक्ष नहीं आ सके हैं। उदाहरणार्थ, मैं कछ घटनाएं प्रकट कर सकता हूँ जिनका सम्बन्ध मेरे साथ है। पंडित लेखराम जी
के कागजों में एक सादा कागज निकला जिस पर केवल इतना लिखा था-ला० मुन्शीसम द्वारा कवित वृतांत 1 मेे
अतिरिक्त इस समय कौन जान सकता है कि मैंने कौन-सी घटनाएं पडित जी को बतलाई थीं । इस प्रकार और बहुत से
सज्जन पुरुषों ने वृत्तांत बतलाये होंगे जो पंडित जी के हृदय में ही समाप्त हो गये। मेरा अभिप्राय इस लेख से यह नहीं है
कि इन त्रुटियों के कारण हमारे सामने स्वामी दयानंद का सम्पूर्ण जीवन नहीं आता, क्योंकि चाहे कितनी ही सावधानी क्यों
न वरती जाये और कितने ही परिश्रम से घटनाएं क्यों न एकत्रित की जाये फिर भी ऐसे महापुरुषों के जीवन के कुछ वृत्तांत
कभी भी विदित नहीं होते । मेरा अभिप्राय केवल यह है कि इस पुस्तक के पढ़ने के पश्चात् जिस भद्र पुरुष के ध्यान में कोई
ऐसी घटना आये जो इसमें लिखा हो तो उसका कर्तव्य है कि वह सारी घटना को भली प्रकार लिखकर आर्यप्रतिनिधि
सभा पंजाब के कार्यालय (लाहौर स्थित में भेज देवे, ताकि दूसरी आवृत्ति में (जिसकी वहुत शीघ्र आवश्यकता पड़ेगी) ज्ञान
का भंडार अत्यधिक विस्तृत हो सके।
भूमिका-लेखक स्वामी जी के सम्पर्क में इस त्रुटि को पूरा करने के लिए मैं पहला पग उठाता हूं। स्वामी

दयानन्द जी महाराज बरेली नगर में १४ अगस्त सन् १८७९ ईसवी को पधारे। उन दिनों मेरे पिता उस स्थान के शहर
कोतवाल थे और कॉलेज में विशूचिका रोग के कारण विशेष छुट्टियां होने के कारण में अपने पिता के पास बरेली आया
हुआ था। उस स्थान पर ही मुझे पहली और अन्तिम बार ऋषिवर के दर्शन प्राप्त हुए। मैं उन दिनों नास्तिक था। काशी
नगर की प्रबल मूर्ति पूजा से व्याकुल होकर मतमतान्तरों में कुछ समय आन्दोलन करने के पश्चात् मैंने ईश्वर की सत्ता को
ही अस्वीकार कर दिया था। ईश्वरीय ज्ञान का न तो कभी मानने वाला था और न ही इंजील और कुरान से मुझे कभी

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