शान्ति प्राप्त है। वेद का नाम ना तीन गो । पारित होने के अतिरिक्त मेरा यह मत था कि संस्कृत भाषा में बादापन
मुखतापन) के अतिरिक्त यहि की कोई बात है नहीं। यही कारण गा कि काशी में शिकाप्राप्यर्थ पांच वर्ष तक निवार
रखने और पंडितों के हठ करने पर भी मैंने लघुकौमुदी का कछ प्रारम्भिक माग पढ़ने और कुछ संस्कृत काव्य के अध्ययन
के अतिरिक्त संस्कृत भाषा ही और कुछ विशेष ध्यान दिया था। मेरे पिता पौराणिक धर्म पर पक्का विश्वास रखने वाले
और प्रतिदिन ३ पंती की पूजा करने वाले थे। पुलिस विभाग में वे अाधारण व्यक्ति समझ जाते थे क्योंकि पूजा और
पुलिस का कोई सम्बन्ध न था । स्वामी दयानन्द का पहला भाषण सुनकर आते ही पिता जी ने मुझसे कहा ‘मुन्शीराम | एक
दण्डी संन्यासी आये हैं। बड़े विद्वान् और योगिराज है। तुम्हार संशय उनकी यवतृता सुन कर निवृत हो जायेंगे ।’ मेरे
पिता को विदित था कि मैं नास्तिक हूँ क्योकि अपने विचारों को छिपाने की योग्यता मुझमें पहले ही से न थी । उत्तर में मैंने
प्रतिज्ञा की कि चलेगा। परन्त और कुछ न कहा क्योंकि मन में उसी समय विचार आया कि संस्कृत जानने वाला साधु बुद्धि
की क्या बात करेगा। दूसरे दिन खजांची लक्ष्मी नारायण की कोठी बेगम बाग में पिता के साथ पहुंचा। दर्शन करते ही कुछ
श्रद्धा उत्पन्न हुई और फिर जब पादरी स्कॉट और दो तीन और अंग्रेजों को सनने का इच्छक पाया तो और भी श्रद्धा वढ़ी।
अभी दस मिनट भाषण-नहीं सुना था कि मन ने कहा यह विचित मनुष्य है,केवल संस्कृत का ज्ञाता होकर ऐसी बुद्धि अनुकूल
बात कहता है कि विद्वान् लोग दंग हो जाये । ‘व्याख्यान ईश्वर के निज नाम ‘ओ३म्’ पर था। में वह पहले दिन का आत्मिक
आनन्द कभी भूल नहीं सकता । इसके पश्चात् मूर्ति-पूजा के खंडन पर व्याख्यान जब आरम्भ हुए तो जहाँ मेरी श्रद्धा बढ़ने
लगी वहां मेरे पिता की श्रद्धा यद्यपि घटी तो नहीं, ढन्होंने व्याख्यानों में जाना बन्द कर दिया और प्रबन्ध का कार्य अपने
अधीन एक सब-इन्सपेक्टर को सांप दिया । मेरे पूछने पर पिताजी ने कहा कि योगिराज दण्डी संन्यासी हैं, ये सब कुछ कह
सकते हैं परन्तु हम गृहस्थियों को तो इसी पर आचरण करना चाहिये-हरिहर निन्दा सुनहि जो काना । होय पाप गोघात
समाना ।(तुलसीदास कृत रामायण)
पहले दिन के व्याख्यान के अतिरिक्त में अन्य किसी व्याख्यान से अनुपस्थित नहीं रहा, प्रत्युत पादरी काट के
साथ जो शास्त्रार्थ है उनमें से पहले दो शास्ताय्थों में काम करता रहा। अन्तिम शास्त्रार्थ के दिन मझे तीव्र वर हो गया था
जिसके कारण मुझे जाते समय भी स्वामी जी महाराज के दर्शन प्राप्त न हुए।

स्वामी जी की तीन वर्णनीय बातें इन दिनों की तीन चार बातें वर्णनीय हैं जो कि मैंने पंडित लेखराम जी को

लिखवा दी थी–शनिवार का दिन था । व्याख्यान टाउन हाल में हो चुका था। बहुत से मनुष्यों ने निवेदन किया कि अगले
दिन रविवार को नियत समय से एक घंटा पूर्व व्याख्यान आरम्भ हो । स्वामी जी ने स्वीकार कर लिया और कहा, “मैं नगर
से ढाई मील के अंतर पर ठहरा हूं और मेरा समय विभक्त हो चुका है, इसलिए व्याख्यान के लिए तो एक घंटा पहले आ
सकता हूँ परन्तु सवारी भी साधारण समय से एक घंटा पूर्व आनी चाहिये क्योंकि मैं ठीक उस समय तैयार होता है, जब
व्याख्यान आरम्भ होने में पन्द्रह मिनट शेष रहें।” इस पर खजांची लक्ष्मीनारायण ने प्रतिज्ञा की कि सवारी एक घंटा पूर्व
पहुंच जायेगी। रविवार के दिन नियत समय से एक घंटा पूर्व प्रत्युत उससे भी पूर्व श्रोताओं का समूह पूर्ववत् एकत्रित हो
गया परन्तु स्वामी जी न पहुंचे। अन्ततः पौन घंटे के पश्चात् बग्घी आई; स्वामी जी उतर कर टाउन हाल में पहुंचे और सोटा
दीवार के साथ टिका कर पूर्व इसके कि प्रार्थना के लिए बैठे, बोले-‘में नियत समय पर तैयार था परन्तु सवारी नहीं पहुंची।
सेप्रतीक्षा के पश्चात् पैदल चल पड़ा, मार्ग में बग्घी साधारण समय पर मिली; इसलिए विलम्ब हो गया। सभ्य जनो ! मेरा
दोष नहीं है, दोष बच्चों का है जो कि प्रतिज्ञा-पालन करना नहीं जानते’ । खजांची लक्ष्मीनारायण जी रुहेलखंड के प्रख्यात
नवानों में से थे और स्वामी जी का आतिथ्य कर रहे थे किन्तु सिर झुकाये चुपचाप सुनते रहे।