तो रत्य ही फकदिन याविण भी वारी महापाराणों की अारम्भत बा ॥
करते-करते उनके नैतिक शिण के दोष दिखाने लगे। वारा सम्म पाद र गिरी, टला और मिम्टर
पवई गय कामश्नर आद पन्द्र बस भनेर नि ने गाणी 3 पौराणिक । पछि माया।
वर्णन करत आए एक-एक गुण कहने रण !ये और पौराणिों से बात पर किया कि द्रौपदी को पत्र।
पति करा कर उसे कुमारी कहना और इसी प्रकार की सारी मन्दोदरी आदि को मारी करना पौराणिक तक शिखण।
को दोषपूर्ण सिद्ध करता है स्वामी जी की वर्णनशैली ऐसी परिहाराणी ती कि श्रोता भने का नाम नहीं जानते थे। इस
पर साहब कलेक्टर और साहब कमिश्नर आदि कांग्रेस हसते और प्रसन्नता प्रकट करते रहे पर इस विषय को समाप्त
करके स्वामी जी महाराज बोले, पौराणिकों की तो यह सीला है, अब किरानियों की लीला सुनो। यह ऐसे ्रष्ट है कि कुमारी
के पुत्र उत्पन्न होना बतलाते और फिर दोष सर्वज्ञ शुद्ध स्वरूप परमात्मा पर लगाते और ऐसा घोर पाप करते हुए तनिक भी
लज्जित नहीं होते।

इतना कहना ही था कि साहब कलक्टर और साहब कमिश्नर के मख क्रोध के मारे लाल हो गये परन्तु स्वामी जी
का व्याख्यान उसी उत्साह के साथ चलता रहा। उस दिन ईसाई मत का व्याख्यान के अन्त तक खंडन करते रहे । टूसरे दिन
पात:कल ही खजांची लक्ष्मीनारायण को साहब कमिश्नर बहादुर बी कोठी पर बुलाया गया । साहब बहादुर ने कहा कि
‘अपने पंडित साहब को कह दो कि बहुत कठोरता से काम न लिया कें हम ईसाई लोग तो सभ्य हैं, इम तो शास्तार्थ में
कठोरता से नहीं घबराते परन्तु यदि असभ्य हिन्दू और मुसलमान उतेजित हो गये तो तुम्हारे स्वामी पंडित केव्याख्यान बद
हो जायेगे’ । खजांची साहब यह सन्देश स्वामी जी के पास पहुंचाने की प्रतिज्ञा करके लौट आये परन्तु स्वामी जी तक इस
विषय को पहुंचाने वाला वीर कहां से मिलता। कई आने-जाने वालों से खजांची ओ ने प्रार्थना की परन्तु कोई भी आगे बढ़ने
का साहस न कर सका। अन्त में दृष्टि एक नास्तिक पर पड़ी और उस पर इस विषय को निवेदन करने का उत्तरदायित्व रखा
गया । कांची साहब उस नास्तिक और कर अन्य व्यक्तियों के सहित कमरे के भीतर परचे । जिस पर नास्तिक यह कह
कर कि कांची साहब कुछ निवेदन करना चाहते हैं पर कि उन्हें साहब कमिश्नर ने बुलाया था’ वहां से खिसक गया और
सारी विपत्ति मानो खजांची साहब के सिर पर टूट पड़ी। अब खजांची साहब कभी सिर खुजलाते हैं, कभी गला साफ करते
हैं । अन्त में पांच मिनट तक आश्चर्य से देखते हुए स्वामी जी ने कहा, ‘भाई, तुम्हारा तो कोई काम करने का समय ही नहीं
है। इसलिए तुम समय का मूल्य नहीं समझ सकते, मेरा समय अमूल्य है जो कुछ कहना हो कह दो ।’
इस पर खजांची साहब बोले, ‘महाराज ! यदि कठोरता न की जाये तो क्या हानि है, इससे प्रभाव भी अच्छा पड़ता
है और अंग्रेजों को क्रद्ध भी करना अच्छा नहीं है आदि आदि। ये बातें अटक-अटक कर और बड़ी कठिनता से खजांची
साहब के मुख से निकली। इस पर महाराज हंसे और कहने लगे, “अरे, बात क्या थी जिसके लिए गिड़गिड़ाता है और
हमारा इतना समय नष्ट किया । साहब ने कहा होगा कि तुम्हार पंडित कठोर बोलता है, व्याख्यान बन्द हो जायेगे, यह होगा
वह होगा। अरे भाई, मैं हुआ तो नहीं जो तुझे खा लूंगा, उसने तुझ से कहा, तू मुझ से सीधा कह देता। व्यर्थ इतना समय
क्यों बनाया ।*

एक विश्वासी पौराणिक हिन्दू बैठा था वह कहने लगा ‘देखो यह तो कोई अवतार है, मन की बात जान लेते हैं।’

अस्तु, यहां तो जो कुछ हुआ वह हुआ। अब व्याख्यान का वृत्तांत वर्णनीय है। मैंने केशवचन्द्र सेन, लाल मोहन
घोष, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, ऐनी बीसेंट तथा अन्य बहुत से विख्यात व्याख्यानदाताओं के भाषण सुने है और वे भी उनकी
उन्नति के काल में, परन्तु मैं सच्चे हृदय से कहता हूं कि जो प्रभाव मझ पर उस दिन के व्याख्यान ने किया और जो विशेषतः