भई महिने गाल पात पर थे तो रिवाज ही ही भय । गिर जाने । उग नि

सर्वर पर अरनव या उरते के मध्य
५ ॥राजा राजा । पहले दिन रात सपन
५ के जर पसा थे। if vT ( 11 , म चुपचाप मग सोका ख्या

मन में भी वो शरण गरी घरमा गोपभान । यस अनुभव करता है। उसके कश
म समय तक पर रहे। ॥ १। ‘म ।होक यो प्रगट न करो कतवर कोषित होगा
संभोग गरी देशा। । । राजा या न न हो, हम । तो होगे । इसके पत्र
उपनिषद-वाय पर लिया है। आमा को न कोई शख खेदन कर सकता है न न न जला सकती।
गरज हुई आग में बोले ‘वह शरीर तो असत्य है। इसकी रखा में प्खृत होकर अधर्म करना ख्यर्थ है, इसे जिस मनुष्य
का जी रहे वाश कर दें। फिर चारों ओर अपनी (ar ॥ो को ज्योति डालकर हिमाद करते हुए वे बोले-‘परन्त वह
सुरमा कोर एरिया मुझे दिखाओ जो यह दावा करता है कि वह मेरे आत्मा का नाश कर सकता है। जब तक ऐसा वोर
इस संसार में दिखाई नहीं देश में यह सोचने के लिए भी उपस नहीं हं कि मैं सत्य को दयाका अथवा नहीं।’

(मनुष्य पुजा की निंदा-रे हाल में सन्नाटा छाया हुआ था, व्याख्यान में कछ विलम्ब हो गया। उठते ही
महाराज ने पूछा, ‘पक का आज नहीं दिखाई दिये। पादरी स्काट साहब को स्वामी जी से बड़ा प्रेम हो गया था और
चुकि वे किसी व्याख्यान में भी अनुपस्थित नहीं हुए थे इसलिए स्वामी जी उन्हें इसी नाम से पुकारा करते थे। किसी ने कहा
कि रविवार का दिन है इसलिए पहीं आये क्योंकि समीप के हो गिरजा में वे रविवार को उपदेश किया करते हैं।टाउन हाल
से नीचे आते ही महाराज कहने लगे कि चलो, स्काट का गिरजा देख आवे । यद्पि अधिकतर श्रोता चले गये थे तवाणि
तीन या चार सौ की भीड़-भाड़ साध ले गिरजा में जा पहुंचे। पादरी साहब ने व्याख्यान अभी समाप्त ही किया था, श्रोतागक
एक सो के लगभग थे। स्वामी जी को देखते ही पादरी साहब नीचे उतर आये और स्वामी जी को वेदी (Pulpit) पर ले ज
कर प्रार्थना की कि महाराज के उपदेश करे। स्वामी जी ने खड़े-खड़े ही बीस मिनट तक मनुष्यपूजा का खण्डन किया,
सब चुपचाप सुनते रहे । यह प्रश्न यह है कि स्वामी दयानन्द जी का सच्चा अनुयायी कौन है ? यदि कोई है तो उसकी
खोज करो क्योंकि वैदिक धर्म की उन्नति का साधन वही होगा।

(घ) वेश्यागमन की निंदा एक दिन स्वामी जी महराज को ज्ञात हुआ कि खजांची लक्ष्मीनारायण ने एक वेश्या
को अपने घर में डाला हुआ है। जब खजांची साहब उस दिन आये तो स्वामी जी ने पूछा, ‘खजांची जी ! तुम कौन हो ?
खजांची जी ने उत्तर दिया ‘महाराज ! आप गुण कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था मानते हैं, मैं क्या उत्तर दें। स्वामी जी वोले कि
यो तो सब वर्णसंकर हैं किन्तु समय के अनुसार तुम अपने को क्या कहते हो?’

खजाची जी ने उतरदिया कि मैं खत्री हं महाराज बोले ‘यदि खत्री के वीर्य से वेश्या में पुत्र उत्पन्न हो तो उसे
क्या कहेंगे ?’ कांची जी ने सिर नीचा कर लिया। इस पर महाराज ने कहा ‘सुनो भाई ! हम किसी का लिहाज नहीं करते
हम तो सच-सच कहेंगे’। उसी रात खजांची जी ने उस वेश्या को कहीं भेज दिया।

परमात्मा से मिलन कैसे हो? भूमिका लेखक को बताया-जगत बीती तो वहुत सी कहानियां है जो किसी
समय के लिए छोड़ता हूँ । अब आप बीती वर्णन करता हूं। मैंने तीन बार महाराज से बातचीत ईश्वर-विषय में की। मुझे
उन दिनों अपने नास्तिकपन का बड़ा अभिमान था । यद्यपि स्वामी जी का सारा उपदेश मुझे अच्छा प्रतीत होता था तथापि
में मन में यही सोचा करता था कि यदि एक ईश्वर और वेद को मानना स्वामी दयानन्द जी छोड़ दें तो फिर संसार का कोई
भी विद्वान् उनका सामना करने वाला दिखाई नहीं देता। मैंने अभिमान में आकर पहली बार केवल शास्त्रार्थ के अभिप्राय