सेयर विषय में आशीष किये परन्तु पांच मिनट मे ही मेरी जिह्ञबद्हो गई। अनत घारे ओर से पुड़ितजञातमे परकर
मैने कहा, महाराज 1 आपकी बुद्धि सही तरीका है आपने मेरी शिह्ा बन्द कर दी पाना मुशिरा न दिलाया !
रामेहर कोई है। दूसरी और तीसरी बार भी उसी प्रकार पांच-पांच मिनट में मेरी बंद हो गई। अब तोगरी यार
मैने विवश होकर वही उत्तर दिया तो महाराज प्रणम तो हंस पड़े गिर गम्भीरतापूर्वक दया, तुमने सकि, मन
उत्तर दिये । यह युक्ति की बात थी मैंने कब प्रतिज्ञा की थौ कि मैं तम्दारा विश्वास ईश्वर पर करा दूगा । तुम्हारा विश्वास
ईश्वर पर उस समय होगा जब ईश्वर स्वयं अपने ऊपर विश्वास करायेगे। ठगी गमग मराराज उपनिषद वाक्य ।
पदा हा जो कि मुझे स्मरण नहीं रहा।

दयानन्द सच्चा ऋषि वा में उस समय तो पुस्तक का गाम्तक ही रहा और उसके पश्दान् जिरकाल तक
अविश्वास की गहरी गुफा में गिरा रहा परन्तु जब मेरे उद्धार का समय आा युव्ति की आवश्यकता न रही । ठन जहाँ
बड़ी-बड़ी शक्तियां परियों मौलवियों और पंडितों की असफल होकर रह गई जहां दयानन्द से योगिराज की बात।।
भी सान्त्वना नदी तहां परमात्मा ने स्वयं अपने ऊपर विवास काया और उस समय मुत्र ऋषि का कवन स्मरण आया।
और मेने उसकी महानता के आगे सिर झुकाया और सहसा मेरे हृदय से ये शब्द निकले कि ‘दयानन्द सच्चा अत्र दा।।

इस पुस्तक का उचित नामकरण
प्यारे पाठकों में आपकी सेवा में निवेदन कर चका हू कि इस पुस्तकको न तो कोई बायोग्राफी (जीवनचणि हो ।
कह सकते हैं और न ही उसे आर्य समाज का इतिहास कह सकते हैं। फिर इसका नाम क्या रखे? इस पुस्तक को नियमित
रूप देने वालों ने तो जो उचित समझा इसका नाम रख दिया परन्तु मैं अपनी ओर से कोई विशेष नाम न रखता हुआ आपके
समझ इस बारे में अपने विचार प्रकट करता है और आपमें से प्रत्येक को यह अधिकार देता है कि अपनी योग्यता और
बुद्धि के अनुसार इस संग्रह का नामकरण संस्कार स्वयं कर लें।

सच्चे जीवनचरित्र का स्वरूप-महान ऋषियों और सत्यप्रिय विद्वानों के जीवनदरित्रों के द्वारा धार्मिक शिक्षा देने
कीरीति आर्यावर्त में कुछ नवीन नहीं है। प्राचीन आर्यावर्त में वानप्रस्थी महात्मा और विरक्त साधुजन सदा पूर्वजों के
आवरण के उदाहरणों के द्वारा अपने शिष्यों को धार्मिक शिक्षा दिया करते थे। उपनिषद् ग्रन्थ जो कि ऋषियों के
वानप्रस्थ काल के उपदेश हैं इस प्रकार के असंख्य उदाहरणों से भरे हुए हैं किन्तु तिथियों को असार और परिवर्तनशील
समझकर उनका वर्णन वह आवश्यक नहीं समझते थे। इस नई रोशनी के काल में बड़े अभिमान के साथ कहा जाता है कि
प्राचीन लोग इतिहास और जीवनचरित्र के सार को नहीं समझते थे किन्तु यदि थोड़ा सा विचार किया जाये तो स्पष्ट स्वीकार
करना पड़ता है कि उन्नीसवीं शताब्दी में इतिहास और जीवनचरित्र के गौरव को अभी तक बहुत कम समझा है। इसमें
सन्देह नहीं कि योरुप की जातियां शताब्दियों के अन्धकार से पुरुषार्थ के साथ निकलती हई अब किचिन्मात्र समझने लगी
हैं कि इतिहास और जीवनचरित्र मनुष्य की सच्ची शिक्षा में कहां तक लाभदायक हो सकते हैं। परन्तु खेद है कि हमारा
अभागा देश अब तक मोहनिद्रा में सो रहा है। महाभारत के भयानक युद्ध ने हमारे साथ केवल यही अन्याय नहीं किया कि
हमसे धर्मात्मा विद्वानों और उच्चतम विचार शक्ति रखने वालों को छीन लिया प्रत्यत हमें सार और असार में विवेक करने
के योग्य भी नहीं छोड़ा। उसके पश्चात् पुराणों का यह अन्धकारमय युग आया जिसमे कि अविद्या और स्वार्थ का पूरा
राज्य हो गया और इस अभागी भूमि के सामने से रहा-सहा प्रकाश भी लुप्त हो गया। फिर कालचक्र में फसे हए भारतवर्ष
का यदि कोई इतिहास विद्यमान न हो तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। आश्चर्य यदि है तो यह कि दर्शनों ब्राह्मणों और सूत्र
ग्रन्थों के द्वारा प्राचीन आर्यावर्त का पूर्ण इतिहास अनन्तकाल की हलचल में क्योंकर बचा रहा? वर्तमान काल में इतिहास
प्राय- तिथियों के संग्रह को कहा जाता है और यद्यपि सच्चा इतिहास विद्यमान नहीं है परन्तु योरुप और अमेरिका के पुरुषार्थी