ोष तो और पापा । तरा। नितिन का ! आता।
मन।। v पागमा इराण
क्रानि के साथ है जो कि परणात्मा के विवभों के अवक अपवा प्रतिकूल वलने पर मनुष्य समाज के किसी भान में उत्प्न
हुआ करती है।

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अब समझा है। पूरा में पॉप में भी हो ॥ उदेश्य रस 10 गन्ना आता मा ।
इसलिए [शिया और साधारण घटनाओं की ऐरो ग्रंथि में धरमार होती भी गाउfaपगारी रुगन अवशरम का
लिया है कि महारा ॥ ॥rलन भरी पटना ।।।। । । ।। मनु शर्मा ।। ।
में कोई विशेष प्रति उपमा कर दी हो।

पाठकगण । स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन का अध्ययन मदि आप यस मनारन क स ।
भारते हैं । इसे हाथ न लगाइये। यदि इस पुस्तक आपने केवल भाषा-सौन्दर्य अववा क्रमव्यवर्था की परीखा करे
के लिए हम में लिया है तो इसे साल रख दीजिये । हो। यदि आपको अपने जीवन के रेय की बात है तो मन वी
साथधान कर अन्त:करण की शुद्धि से इन महीन किन शिक्षाप्रद पृष्ठों को उलटिए। विनय ही शुभ परिणाम पर पान
आइयेगा ।

स्वामी दयानन्द का कार्य महान् यह एक मानी ? यात कि वर्तमान काल की उन पटना में गरि
कि सारण कहकर सम्बोधित किया जाता है, स्वामी दयानन्द कार्य भी एक श्रेष्ठ स्थान रखता है। प्रोफसर मेक्समरा
से लेकर सिर मोनियर विलियम्स* जैसे पक्षपातपूर्ण विदेशी राई तक और कट्टर मृर्तिपूजकों से लेकर बिशननागायज दा
सरीखे स्वतन् स्वदेशी पुरुष तक, सभी इस बात पर एकमत हैं कि कम से कम भारतवर्ष में स्वामी दयानन्द की समाना
करने वाला दूसरा सुधारक इस शताब्दी में उत्पन्न नहीं हुआ। फिर इसमें क्या सन्देह है कि भारतवासियों के तिए स्वाम
दयानन्द के जीवन-खुत्तान्त से बढ़कर और कोई ध्यान नही हो सकता ।

उन्नीसवीं शताब्दी में ऋषि-जीवन का महत्व
भारत का इतिहास विश्व-इतिहास की संसार का सामाजिक इतिहास मनुष्यों के विचारों और कर्मों का
संग्रह समझा जाता है। किसी सीमा तक तो यह विचार ठीक है परन्तु यदि गढ़ दष्टि से देखा जाये तो संसार का इतिहाम
बनाने वाले केवल कुछ ही चेतन आत्मा प्रतीत होंगे और उनका भी संसार के सच्चे इतिहास से वहां तक ही सम्बन्ध दिखई
देगा जहां तक कि कोई नवीन विचार चेतन-जगत् में उनके द्वारा पका गया है। अन्यथा खाना, पौना, उठना बैटना जागन
सोना चलना-फिरना और इसी प्रकार से इन्द्रियों की अन्य साधारण चेष्टाओं का तो मनुष्यसमाज के इतिहास से रोई रे
सम्बन्ध नहीं है। जिस प्रकार के जड़ जगत् का इतिहास समझने के लिए वे बड़े व प्रारम्भिक नियम जानने आवश्यक ?
| है कि प्रत्येक काल की चेष्टाओं के मौलिक नियम रहे है। इसी प्रकार चेतन जगत् का सच्चा इतिहास तब तक समझ में
नहीं आ सकता जब तक कि उन बड़े-बड़े व प्रारम्भिक नियमों का ज्ञान प्राप्त न किया जाये जो कि प्रत्येक काल के शेड
काम करते रहे हैं। आकाश अवस्था से वायु अवस्था में आने के लिए सहस्रों वर्ष लगे और उस दीर्घशल में क्या-द
बेशर नहीं होती रही है और फिर वायु से अरिन अग्नि से जल और जल से पृथिवी को अवस्था में परंचने के लिए किडरे
असं रात की आवश्यकता थी । इन करोड़ों वर्षों के समय में असंख्य चेराए जड जगत् में होती रही हैं परन्त जब तक
कि भूगर्भ विद्या के विद्वानों ने प्रत्येक काल का आरम्भिक नियम न जाना, तब तक उन अनगिनत चे
विदित हुआ जो कि एक-एक कार के भीतर अज्ञानता की टूष्टि मे एक दूसरे से पथक प्रतीत हो रही थी ।