रहेगी। अपने हदय से हो कि सतयुग किस प्रकार से आ सकता है । तुम्हे बतलाया जाता है कि हम
का नाश कर दिया है। सनी हुई बातों का कुछ समय के लिए त्याग करके घटनाओं के आधार पर भला
दयानन्द नै धर्म का नाश किया है या तम्हारे बिछड़े हुए धर्म को तुमसे फिर मिलाने की चेष्टा की है ।
साक्षी देता है-कि वेदों का सम्मान करने वाला दयानन्द, वेदों के प्रेम में पागल कहलाने वाला दयानन्द ऋषियों की
को सहन करने वाला दयानन्द कभी भी धर्म को हानि पहुंचा सकता है । क्या तुम यह अस्वीकार कर सकते हो किदयानर
ने तुम्हे उन वेदों का पता दिया जिनका कि चिरकाल से तुमने दर्शन तो क्या श्रवण भी नहीं किया था। आओ ।।
एकाएक प्रकट होने पर चुधिया मत जाओ, सावधान हो कर दृष्टि डालो। यह प्रकाश तुम को अविद्यारूपी गर्न से नि
वाला है। प्रकाश का पता देने वाले के जीवनवृत्तान्त को दीर्घदृष्टि से पढ़ो ताकि तुम्हें प्रकाश से लाभान्वित होने व

प्राप्त होवे ।

। बड़े भाइयों से अपील- है मेरे बिछुड़े हुए मोहम्मदी और ईसाई मित्रो ! अविद्या की अन्धकारमय रात्रि में
कि हाथ पसारा नहीं सूझता था तुमने भाइयों के हाच छोड़कर अन्यों के हाथ में अपना हाथ दे दिया। जय क्रियात्मक
में तुम्हे विदित हो गया कि तुमने मूर्खता की है और तुम्हारे आत्माओं ने साक्षी दी कि तुम निज गृह से दूर जा रहे हो
तुमने व्याकुल होकर आतुर वचनों से अपने भाइयों की ओर देखा । तुम्हारे भाई उस समय स्वयं देखने के योग्य देल
तुम्हारा हाय क्योंकर पकड़ते ? परन्तु अब अन्धकार दूर हो गया, वेदरूप सूर्य का प्रकाश हो गया, जीवन के उद्देश्य हो
समझो और अपने उस भाई के जीवन-वृत्तान्त को पढ़ो जिसने कि तुम्हारे लिए; नहीं-नहीं केवल तुम्हारे लिए ही नहीं प्रत्यक्ष
सत्य की खोज करने वाले के लिए, अपनी जान को हेय समझा, सांसारिक सुख तथा आनन्द को हेय समझा और परमेश्वर
के अटल नियम के आगे सिर झुकाए हुए अपने मिशन को पूरा किया।
हे शिक्षाप्राप्त भाइयो ! इतिहास का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन करने वालो ! उन्नीसवीं शताब्दी में ऋषिजीवन क्या
एक अचम्भा नहीं है? मतवादियों के अद्भुत चमत्कारों से बढ़कर क्या यह एक अद्भुत और आश्चर्यमय

चमत्कार नहीं है?
हे दयाल पिता ! प्रत्येक मनुष्य को चाहे वह किसी वर्ण, स्वभाव, जाति अथवा सम्प्रदाय का हो, सामथ्य देकि
दयानन्द का जीवन-वृत्तान्त पढ़ते हुए उसके मिशन पर विचार करते हुए उन सिद्धान्तों को दयानन्द से पृथक् करके उन पर
विचार करने की शक्ति प्राप्त करे जिनके प्रचार के लिए कि तूने दयानन्द को विशेष शक्तियां प्रदान की थी।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
महर्षि स्वामी दयानन्द जी का जीवन-चरित्र

प्रथम भाग

अध्याय १
घटनाओं की खोज में लेखक का प्रयत्न : प्राक्कथन
नाम और जन्मस्थान न बताने के कारण-स्वामी जी ने अपना और अपने पिता का नाम किसी को नहीं बढलाया,
इसके कई कारण हैं।

(१) पूर्ण वैराग्य से जब सांसारिक धन्धों को त्याग कर मनुष्य ईश्वरपरायण हुआ तो फिर सम्बन्धियों के नाम
अपने आपको सांसारिक बन्धनों में बसाना है जो संन्यासी के लिए कदापि उपयुक्त नहीं।

(२) महात्मा संन्यासी लोग इस बात को आश्रम बदल जाने की दृष्टि से अच्छा नहीं समझते क्योंकि इससे रमत्या
परमात्मा की भक्ति और योगाभ्यास आदि साधनों में विन पड़ जाने की आशंका है। जिन साधुओं ने ऐसा किया उ
गृहस्थ सम्बन्धों में फंसना पड़ा। इसके हजारों उदाहरण विद्यमान है। जैसे लेखक श्री प्रकाशात्म यति के विषय में उनके
विद्वान् टीकाकार ने यह लिखा है-‘यतयः स्वकीयनिवन्येषु स्वदेशकालादिकं प्रायो नैव निरूपितवन्त इति भगवत
श्रीप्रकाशात्मयतेः स्वदेशकालौं सम्यन ज्ञायेते तथाप्यनुमीयते यद्विद्यारण्यसमयात्पूर्व तस्य स्थितिरासीदिति।’

अर्थ-संन्यासी लोग अपनी पुस्तक में अपने देश और जन्म समय को प्राय: प्रकट नहीं करते हैं, इसलिए महात्मा
प्रकाशात्म यति के देशकाल का पता नहीं लगता परन्तु फिर भी विदित होता है कि वे विद्यारण्य स्वामी से पहले हुए थे।

(३) जिन-जिन धार्मिक शिक्षकों ने अपने सम्बन्धियों के नाम बतलाये या उनसे प्रकट सम्बन्धन रखते हुए भी
सम्बन्ध रखा, उन द्वारा प्रचारित धर्म में मनुष्य पूजा अथवा समाधि पूजा की साझेदारी पर आधारित प्रथाएं प्रचलित हो गई
जिनसे उनका छूटना नितान्त कठिन है। स्वामी जी ने इन सब भ्रमों और नारितकतापूर्ण दृश्यों को आंखों से देखा और बहुत
से धार्मिक नेताओं का जीवनचरित्र पढ़कर और अपने अनुभव से पूर्ण सोच विचार करके यही उचित समझा कि मनुष्यपूजा
तथा समाधि पूजा और स्थान पूजा की घृणापूर्ण शिक्षा और उसकी सभ्यता कृषक प्रथा को वैदिक धर्म के अनुयायियों से सर्वथा
पथक रखा जाये । इसलिए उन्होंने अपने और अपने माता-पिता का नाम प्रकट करना उचित न समझा।

उनके कार्यों के प्रति जनता का आकर्षण और जीवनवृत्त जानने की जिज्ञासा-मार्च, सन् १८६० में उनका
होनहार स्वभाव अपने चमत्कार दिखाने लगा और उसी समय से शिक्षित व्यक्तियों का ध्यान उनके कार्यों की ओर आकृष्ट
हुआ। अप्रैल, सन् १८६७ से वे पाखण्डखंडन और सत्य धर्म को मंडन में पूर्णतया संलग्न हो गये ।* नवम्बर, १८९६ में
जब कि उन्होंने बनारस में एक महान विजय प्राप्त की उनकी ख्याति और भी अधिक होने लगी। सन् १८७२ में जब