शान्ति दूत के आगमन के चिर सभी ने देखे-उन दरदयों में केततवही गोटे से खयवित ही रध्मिलित नहीं
े जिनका पालन-पोषण भारत भूमि में भी था । प्रति पर ही विचारों की गोद में घले रुए भी और भी गया ।
पाठशाला में शिक्षा पाये तो ऐसे उत्तम पुरुष विमान थे जिन्हें गष्ट रूप से प्रतीत हो । गा कि आपोवनी मासिक
ज्ञान संसार में फिर एक बार हलचल मचा देगा। मन १८७७ ई० में ररर एलड लागत ने ठरा विस्त हलचल गए।
दृष्टि से भांषकर जो कि भारतवर्ष के पत्ता में भती हा थी भविष्यवाणी की थी कि भारतवर्ष में ब्राह्मण धर्म में जय
सिरे से जीवन फेकने वाला सि बनत शीघ्र आने वाला है । उपर्थक्त राजजनने अपनी पर एशियाटिक टीज’ (Antic
studies) के पृष्ठ ११८ पर इस विचार को स्पष्ट रूप से वर्णन किया है और फिर भारतवर्ष की वर्तमान आत्मिक दशा पर
विचार करते हुए उन्होंने उक्त पुस्तक के पाठ १३0 पर कहा है किरी बहे आन्टोलन के भारतवर्ष में आने के लथण दिखाई
दत है, याद शान्ति बनी रही। परन्तु उस आन्दोलन का वया रूप होगा और किस ओर उसका प्रस्ार होगा यह वर प्रश्न है।
जिसका उत्तर कि समय देगा।’

आने वाला बड़ा आंदोलन आर्य समाज सिद्ध हुआ–कि की गति और हिन्दू समाज के आचरण ने उत्तर
दिया कि वह आन्दोलन आर्य समाज है और बाल ब्रह्मचारी के पोडशवपीय प्रवार ने जिस अवधि में परमात्मा के ने।
सेवक े सत्य का सहारा लेकर भारतवर्ष के विशाल महाद्वीप के एक सिरे से दसरे तक आत्यिक हतवल मचा दी थी जिस
अवधि में भारत निवासियों ने आश्चर्य से सना था कि परमेश्वर न केवल हमारा न्यायकारी पिता ही है प्रत्युत हमारी दयातु,
माता भी है, जिस अन्तर में कि ईसाइयों ने आश्चर्य के साथ जान लिया कि धातभाव को मानुषी सहानुभूति के संचित घरे ।
से निकाल कर प्राणधारा मात्र तक विस्तृत करने की आवश्यकता है। हो । बाल ब्रह्मचारी के उसी पोड़श-वर्ीय प्रवार न।
बड़े गम्भीर शब्दों में उत्तर दिया कि ब्राह्मण धर्म में नये सिरे से जीवन पूंकने वाला स्वामी दयानन्द है।

इस पुस्तक का उचित नाम-ब्राह्मण धर्म में नया जीवन फूकने की कहानी
सज्जन पुरुषों ! बस, यह पुस्तक ब्राह्मण धर्म में नये सिरे से जीवन फंके जाने की एक पूर्ण कहानी है।

उस ब्राह्मण धर्म की विशेषता क्या है? यह प्रश्न है जिसका उत्तर कि स्वामी दयानन्द ने अपने जीवन में दिया
है । इसलिए भारत संतान में से प्रत्येक का कर्तव्य है कि उस जीवन का सम्यक् रूप से अध्ययन को ।।

| पं लेखराम जी की शैली की विशेषता साधारणतया जीवनचरित्र से लेखक के विचार प्रकट हुआ करते हैं
और पढ़ने वालों को निष्पक्ष विचार का अवसर प्राप्त होने के स्थान पर किसी एक विशेष पक्ष में फंसना पड़ता है, परन्तु
पण्डित लेखराम ने आपको किसी विशेष पक्ष में फंसाने का यल नहीं किया। केवल घटनाओं को बिना किसी काट-छांट
के आपके विचार के लिये आपके सामने रख दिया है।

ब्राह्मण गर्मियों से निवेदन- आर्य पुरुष ! इस पुस्तक को एक सिरे से दूसरे सिरे तक विचार-पूर्वक पढ़ जाओ
और फिर सोचो कि वे कौन से सिद्धान्त थे जिन्होंने कि एक लंगोटबन्द साधु को वह शक्ति प्रदान की थी जो इस समय
महाराजाओं में भी दिखाई नहीं देती। पता लगाओ कि आर्यसमाजों के स्थापित करने से ऋषि का क्या प्रयोजन था?
दयानन्द की जीवन यात्रा के मार्ग पर पथ-प्रदर्शन के लिए चिह्नों की खोज करो और जिस समय कि तुम्हें उनति का शिखर
बड़ा ऊँचा और भावना प्रतीत हो, उस समय इस ज्योति स्तम्भ की ओर टकटकी लगाकर ऊपर चढ़ते चले जाओ। फिर
देखो कितनी सरलता से मार्ग समाप्त होता है। मेरे प्यारे हिन्दू भाइयो ! ब्राह्मणधर्म का अभिमान करने वालो ! तुम्हारे लिए

इस पुस्तक का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। तुम पुराणों में सुनते आये हो कि कलियुग में भी सतयुग की लड़ो वर्तमान