उस अंधकारपूर्ण काल में जो कछ मार-काट के जिस-जिस प्रकार के अत्याचार दोनों ओर से किये मये, उनका
करना हमारा काम नहीं है। हमें इस स्थान पर केवल उसके परिणाम से प्रयोजन है । अन्ततः महारानी का कोमल हदय टि
गया। उनके पास प्रत्येक अत्याचार की रिपोर्ट पर चुकी थी परन्तु विद्रोहियों को उनके अपराधों के दण्ड देकर ।
महारानी ने अपना दया का हाथ फैलाया। उन्होंने समझ लिया कि प्रजा पुत्र के समान है । उन्हें विश्वास हो गया कि
कर्तव्य का भार वणिकों को सौंपने का यही परिणाम होना था। अपने कर्मों का फल भारतवासी भुगत चुके । अब पुत्र क
अधिकार है कि माता से सीधे बातचीत करें। इस शभ सूचना की घोषणा महारानी ने कर दी जिसको भारतवर्ष में फैलाई।
वाला लाई कैनिंग था।

परन्तु आत्मिक क्षेत्र का युद्ध इतना शीघ्र समाप्त होने वाला न था। वहां भी प्रबन्धक वणिको के हाथ में था। मन
मतान्तरों के नेता और उनके प्रचारक जिनका काम ही यही है कि अपने मत को जहां तक हो सके बढ़ावे, भारतवर्ष की प्र
के हदय को डाँवाडोल करने लगे परन्तु इन हदयों के ज्ञाननेत्र खुल चुके थे, अब बन्द हो तो क्याकर? मसीही प्रचारकों
आश्चर्य से देखा कि जो स्कूल और कालिज उन्होंने अपने मत की वृद्धि के लिए स्थापित किये थे, उन्हीं की शिक्षा द्
भारत-निवासियों को उनसे घृणा उत्पन्न कराने का साधन बन चली । भारत-पुत्र व्याकुलता की दशा में समझ बैठे कि हम
को आत्मिक पिता ही नहीं है। मनुष्य पूजा से पीड़ित होकर उन्होने अपने स्वामी को ही भुला दिया परन्तु इसमें उनका अपराध
भी क्या था। जब इसी संसार में विद्यमान महारानी विक्टोरिया को कम्पनी के अधिकारियों की सताई हुई भारत की प्रा
भूल गई थी तो फिर सूक्ष्म से सूक्ष्म जगज्जननी को यदि पादरियों और पुजारियों के अत्याचारों से पीड़ित होकर उसके
पूर्णतया छोड़ दिया हो तो इस पर कौन विचारशील पुरुष आश्चर्य कर सकता है। नास्तिकता का राज्य हो गया जिय
प्रकार सन् १८५७ के भयंकर समय में भारत की प्रजा ने विक्टोरिया और उसके विधान का त्यागकर दिया था उसी प्रकर
बड़ा भयानक विद्रोह आत्मा लोक में भी फैल गया और ईश्वर और उसके ज्ञान वेद को सबने भुला दिया। उस अन्धकार
काल में जितना आत्माओं का घात हुआ उसका वर्णन करने की शक्ति इस निर्बल लेखनी में नहीं है।

देश के आत्मिक जगत् में विद्रोह भारतवर्ष का कौन-सा शिक्षाप्राप्त नवयुवक पुत्र है जो कि अपने विद्रोह के
काल का स्मरण करके इस समय शान्ति प्राप्त होने पर भी कांप नहीं उठता और अपने पूर्व जीवन पर रक्त के अश्र नहीं
बहाता ? यह वह भयंकर काल था जब अपूर्ण अंग्रेजी शिक्षा के कारण हम सब को सन्देह हो गया था कि संस्कृत के शब्दों
में कोई बुद्धि की बात भी लिखी हुई है अथवा नहीं। यह वह भयानक समय था जब मसीही पादरियों ने आर्यावर्त के
नवयुवकों को यह पाठ पढ़ाया था कि उनके वेदों की शिक्षा हजरत नूह के वंशजों ने भारतवर्ष में फैलाई है। यह वह समय
था कि जब वेदों के मंत्रों को इस्माइल जोगी के छुमन्तरों में सम्मिलित किया जाता था। सारांश यह है कि जब भारतवर्ष
की प्रजा के पापों का प्याला भर गया और आत्मिक जगत् में ऐसा घोर अन्धकार फैला कि भारतनिवासी अपने सिरजनहार
को भूल गये, उस समय जहां एक ओर अद्वैत ब्रह्म ने रुद्र रूप का प्रकाश करके भारतवर्षीय प्रजा को न्याय के तीक्ष्ण खदग
से उनके शताब्दियों के बिगड़े हुए आचरणों के लिए दण्ड दिया, वहां दूसरी ओर प्रेम और विद्या का अमृत दोनों हाथों में
लिये अपने जननीरूप का विस्तार किया और अपना शान्ति-पत्र जो कि सदा एकरस ब्रह्माण्ड के एक-एक परमाणु पर विद्युत्
के अक्षरों में खुदा हुआ रहता है, अपने सच्चे सेवक द्वारा भेजा। घन्य है जगज्जननी ! धन्य है उनका शान्ति पत्र ! इस सच्चे
सेवक के आगमन की सूचना केवल यही घटनायें नहीं दे रही थी, प्रत्युत दुरदशी लोग अपने विचार के दर्पण में उन्नीसवीं
शताब्दी के ऋषि के आगमन की ओर टकटकी लगाये बैठे थे।