यि दयानन्द के आविर्भाव की परिस्थिति- परन्तु जब शंकर अपना ठदेश्य पूरा करके चल दिया मानदी
दर्बलता ने भारतवासियों को फिर आन याया । प्रत्येक प्राण घरो स्वयं ईश्वर बन बैठा, शान्ति कोसों दर भागी । प्रकृति
के नियमों का सामना करने की शक्ति रखते हैं मनुष्यों के हदयों ने जब साक्षी दी कि वे ईश्वर नहीं हो सकते तब विश्वास
को शिथिलता ने आन दबाया । प्रत्येक मनुष्य व वस्तु जो बयानक अथवा विचित्र दिखाई दो उसी को अविद्याप्रस्त भारत
ने अपना इष्टदेव ठहराया। ऐसी हलचल उत्पन्न हुई कि किसी सिद्धान्त का विवेक न रहा। ऐसे धार समय में पाश्चात्य
विज्ञान और पाश्चात्य नास्तिकता एक ओर तथा जड को मनुष्य द्वारा पूजा दूसरी ओर भारतवासियों को अपना प्रास बनाने
के लिए आ खड़ी हुई। समय और अधिक भयानक हो चला। चारों ओर से टकटकी लग रही थी कि इस काल की व्यवस्था
के अनुसार आरोग्यप्रद सिद्धान्त चलाने के लिए ऋषि कब प्रकट होता है कि महर्षि दयानन्द का आदिधभाव हुआ ।
उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में अंग्रेजों ने भारतवर्ष में दृढतापूर्वक पांव जमा लिए थे । लार्ड ऐमहर्ट के
शासनकाल में ब्रह्म देश तक अंग्रेजों का हाथ बढ़ चुका था। आर्यावर्त की परतत्र जनता अपने लिए नवीन शासकों को
उसी उपेक्षा से स्वीकार कर चुकी थी जो कि आठ शताब्दियों की निरन्तर परतत्रता के कारण उसकी आदत बन चकी थी।
ब्रिटिश राज्य सत्ता बाहरी और भीतरी शत्रुओं के भय से मुक्त होकर उस समृद्धिशाली राज्य में क्रम और प्रबन्ध का तत्व
डालने के लिए उद्यत हो रही थी जिसको कि ईश्वरीय नियम के अनुसार उन्होने अकस्मात् अपने कब्जे में देखा । युद्ध के
व्रणों पर मरहम लगाने का समय आ गया था । इंगलैंड के छोटे से द्वीप से लार्ड विलियम बैंटिक भारतवर्ष के गवर्नर जनरल
के पद का भार संभालने के लिए चल दिये थे र जहाज में सधारों पर विचार करते आ रहे थे जिनका आविर्भाव अन्त में
उनके सप्तवषय शासनकाल में हुआ। मसीही पादरी काफिर पाषाण पूजा और मूख्ख अर्ध-असभ्यों को मानवी सहानुभूति
और पाश्चात्य सभ्यता का पाठ पढ़ाने का दावा करते हुए हजारों मील की यात्रा पर चल पड़े थे। भारतवर्ष में शारीरिक
युद्ध के साथ-साथ आत्मिक संघर्ष भी आरम्भ हो चुका था । बंगदेश में राममोहन राय का विशाल हृदय अपने भाइयों को
पाषाण पूजा और भ्रमण के जंगल में फंसा हुआ देखकर व्याकुल हो चका था । चारों ओर अन्धकार हो अन्धकार देखकर
उसने उपनिषदों में कुछ चमत्कार-सा देखा था परंतु खेद है कि सांसारिक युद्ध में मन विदिप्त होने के कारण उसे आगे
बढ़ने का साहस न हुआ। वेदों के महान् प्रकाश और उसकी विचाररूपी तीक्ष्ण किरणों को सहन करने की शक्ति न रखते
हुए उसकी आंखें चुन्थियां गई । ब्रह्मसभा तो स्थापित हुई परन्तु खेद है कि मूर्तिपूजा की फौलादी श्रृखलाओं को काटने
वाले वीरों में मनुष्य पूजा को रेशमी डोरी को काटने का साहस न हुआ। लोग मूर्तियों की दासता से स्वतन्त्र होकर मसीह
की दासता में फंसने लगे। एक और भरतपुर के दृढ़ किले पर अंग्रेजी सेना की चढ़ाई और दूसरी ओर प्राचीन आर्यों के
रहे-सहे ब्रह्मविद्या के गढ़ पर मसीही सेना का आक्रमण होने की तय्यारी हो रही थी कि सन् १८२४ में काठियावाड़ के एक
छोटे से ग्राम में एक औदीच्य ब्राह्मण के घर एक पुत्र ने जन्म लिया।

इसके पश्चात् कछ समय तक जहां एक ओर सांसारिक राज्य प्रबंध में शान्ति होने लगी, वहां दूसरी ओर आत्मिक
भोजप्रबन्ध में भी शान्ति और सन्तोष के लक्षण दिखाई देने लगे ।ईसाई मिशनरियों के प्रयत्न फल लाने लगे । सहस्रो व्याकुल
आत्माएं मूर्तिपूजा और अन्य प्रमों से घबरा कर मसीही मनुष्य पूजा की शरण लेने लगीं। धर्म का फिर नाममात्र राज्य दिखाई
देने लगा। अंग्रेजी शिक्षा के कारण लोगों की आंखें खुलने लगीं। जहां एक ओर भारतवासियों के हृदय में राजनीतिक
उमंगें उछलने लगीं, वहीं दूसरी ओर भिन्न-भिन्न प्रकार के आत्मिक भाव भी उत्पन होने लगे 1 उस समय भारतवर्ष की
प्रजा ने जहां एक ओर देखा कि अपनी महारानी विक्टोरिया के पास उन्हें सीधे अपना प्रार्थना पत्र ले जाने की आज्ञा नहीं,
अत्यंत एक व्यापारियों की कंपनी’ में बाधक हो रही है, वहां दूसरी ओर अपने आत्मिक पिता जगदीश्वर के पास अपनी
प्रार्थना ले जाने में भी उन्हें मसीह आदि पुरुष मार्ग में बाधक दिखाई दिये पन्तु चूंकि सांसारिक और आत्मिक दोनों लोगों
उनके भीतरी और बाहरी दोनों नेत्र खुल चुके थे