ज्ञान के जो-एक सिद्धांत के प्रति संसार के विचारो की कागापसतट कर दी है परन्तु ज्ञान के गे महान् सिद्धान
संसार में प्रकट कर कर होते है? जिस प्रकार कि हम एक-एक श्वरीय वियम का केगल जगत् को उन रचना की।
देखने से ही लगा सकते है ।जिससे कि ने नियम काम करते है. इसी प्रकार हम ज्ञान के पकित्र नियमों का पता ठग माप ।
के जीवन चरित्र से लगा सकते हैं जो कि उन नियमों के प्रचार के लिए परमात्मा के नियमानुकूल अपने कर्मानुसार नियक्त्
किये जाते है। मनुष्य समाज के प्रत्येक काल के आरंभ में उस काल की आवश्यकता के अनुसार ज्ञान का कोई एक नियम
प्रकट होता है जो कि मनुष्य समाज के विचारों में परिवर्तन करने के लिए जादू की-री शक्त रखता है। ऐसे प्रत्येक नियम
का स्पष्टीकरण किसी न किसी जीवात्मा के द्वारा होता है जो कि कदाचित् कई पूर्वजन्मों के साधनों से इसी नियम के प्रचार
के लिए तैयारी कर रही थी।

महात्मा गड का आविर्भाव-उपनिषत्कार ऋषियों के काल के पश्चात् जब मनुष्य अपनी निर्बलता के कारण
बुराइयों की ओर पकने लगे, सच्चे ब्राह्मणों का अभाव हो गया। वेदों के सिद्धान्त में गड़बड़ होने लगी और अविद्या में
फंसकर मदिरा मांस और व्यभिचार के कग को धर्म का बाना पहनाकर धर्म को दुषित करना आरम्भ हो गया। उस समय
कई जन्मों के साधनों से सुसज्जित महात्मा बुद्ध का आविर्भाव हुआ। भारतवर्ष में दराचरण की विकराल सेना के राज्य में
चारों ओर हाहाकार देखकर बुद्धदेव ने शुद्धाचार के सिद्धान्त का प्रचार किया । वाममार्ग रूपी वेश्या को जो कि अपने केश
खोल कर बेरोक-टोक भारतवर्ष के गली कूचों में विचरती थी, अपना मुख छुपाना पड़ा। अन्याय दया में परिवर्तित हो गया।
परन्तु महात्मा बुद्ध ने अंतिम अपना कर्तव्य पूरा किया और चल दिये। मानवी दुर्बलता के उस महान् आन्दोलन के मृल
सिद्धान्त को भुला दिया । सब्जी पुरुषार्थ का पाठ बुद्धदेव ने पढ़ाया था परन्तु लोगों ने पुरुषार्थ के सच्चे अर्थ को न समय
कर उसे अभिमान में परिवर्तित कर लिया। कर्मों का फल देने वाले परमात्मा को वे भूल गये । बुद्धदेव ने अनन्त शान्ति का
नाम मुक्ति रखा था, संसार की भावनाओं से छूटने का नाम मोक्ष बतलाया था। लोगों ने अपने समस्त विचारों को उसी
संसार में सीमित कर दिया जिससे छुड़ाने के लिए बुद्धदेव का सारा पुरुषार्थ व्यय हुआ था।

शंकर का आगमन-समय ने फिर पलटा खाया। चिरकाल तक लोग जड़पूजा करते रहे । अन्ततः ज्ञान के
आरम्भिक सिद्धान्त के प्रकाश का काल भी आ पहुंचा। ज्ञात नहीं कि कितने जन्म-जन्मान्तरों में साधन करने के पश्चात
आत्मिक सिद्धान्त का प्रकाश स्वामी शंकराचार्य के द्वारा हुआ। प्रकृति पूजा के विचारों के दुर्ग को उनकी प्रबल यक्तियों
और उनके अटल वेद प्रमाणों के शख्स ने चकनाचूर कर दिया। आत्मा का राज्य हो गया परन्तु मनुष्यों की दर्बलता ने फिर
इस पवित्र आन्दोलन के भी नियम न समझे 1 आत्मा का महत्व दर्शाना शंकर का काम था परन्तु उसके अनुयायियों ने आत्मा
से भिन कोई वस्तु ही न रखी। यहां तक कि नास्तिकता का पाठ पढ़कर स्वयं ईश्वर बन बैठे।

व्यक्तियों का महत्व नहीं, उनके सिद्धान्त महत्वपूर्ण-प्यारे पाठकगण ! आओ। अब थोड़े समय के लिए इस
आश्चर्य युक्त कहानी पर विचार करें । क्या बुद्ध ने, जो हमारी भांति ही दश इन्द्रियों, पांच प्राणों और मन की चारों वृत्तियों
का राजा था किसी अपनी शक्ति द्वारा भूमण्डल के लगभग आधे भाग को अपने विचारों का अनुयायी बनाया था? क्या
शंकर ने जो कि हमारे समान ही खाने-पीने, उठने-बैठने की चेष्टाएं करता था, किसी अपनी शक्ति से बौद्ध और जैन मत को
भारतवर्ष से भगा दिया था? आहार और निद्रा आदि के दास जो बुद्ध और शंकर थे, हमें उनसे कछ भी प्रयोजन नहीं है।
मनुष्य समाज के इतिहास की नींव उन्होंने नहीं डाली प्रत्युत उस एक-एक सिद्धान्त ने डाली जिनको संसार में फैलाने के
लिए बुद्ध और शंकर साधन बनाए गए। जहां बुद्धदेव समय की आवश्यकता के अनुसार पुरुषार्थ के सिद्धान्त के प्रकटीकरण
का साधन था वहां शंकराचार्य आत्म ज्ञान अर्थात् ब्रह्मविद्या के सिद्धान्त का प्रचार करने के लिए चना गया था।