दही कहानी बेढन जगत् की और उसको अपने पात्रों के अधिकतर गाकरण के लिए हम यदि केवल अपने
देश का इतिहास ही ले तेरे तो न केवल पर्याप्त होगा प्रत्यव सर्वथा उचित भी होगा क्योकि जिस प्रकार मनुष्य की
(वा प्रत्यकश और कान के विद्वानों ने बतार का दांत बताया है उमी प्रकार भारतवर्ष को यदि समस्त सार।
कोटा कहा जाये तो अनपयक्त न होगा। और फिर जब हम यर देखते है कि निष्यश्ष साक्ी कम से कम बहाँ तक तो
सिद्ध करने और स्वीकार करने के लिए उरात है कि मनुष्य-सृष्टि का आरम्प भारतवर्ष के उत्तरीय भाग में पहले पहल
हुआ तो यह उदाहरण ठीक समय अनुसार प्रतीत होता है।

भारतीय इतिहास का काल-दिभाजन: महपरुयों के प्रदर्भाव के आधार परमारतवर्ष का इतिहास भी हम
अपने ज्ञान और खाज के अनुसार कब-बड़े शतों में विधात का सकते है। वैदिक ऋषियों के काल को यदि एक ही
दीपक मान लिया जाये (यापि सम्भव है कि ज्ञान के बहते पर हमें उस अवाह काल को कई भागों में विधक्त करना
पह) तो उसके पश्वात् उपनिषल्कारो के फल की उमति और पतन का समझना कछ कठिन नहीं रहता और फिर वाममार्ग
क अंधकारमय काल से घबराकर मनुष्यों में प्रकाश की खोज गौतम बुद्ध का संघर्ष और उसके पश्चात् जैनमत का प्रचार
और फिर धीरे-धीरे पूजा की प्रवतता इस नये अन्धकार से छुटकारा दिलाने के लिए स्वामी शंकराचार्य का आधि भवि।
और फिर मानवी दुर्बलता के कारण पुरुषार्थ का नाश और अतिता का राज्य कहने का अभिप्राय यह है कि इसी प्रकार
क्रमशः हम भारतवर्ष के इतिहास को तीन बड़े भागों में विभक्त कर सकते है । परन्तु यद्यपि इस इतिहास के एक-एक काल
को पूर्ण रूप से समझने के लिए हम उस काल का रहन-रहन रोतिरिाज विद्या कौशल शिल्प व्यापार, बोलचाल और
सगा के परस्पर सम्बन्ध विस्तृत वृतांत जानने की आवश्यकता है, तथापि ये सब बातें समझ में आनी कठिन हो जाती
हैं। कम से कम उस काल की जीवन तय्या के ठीक कारण तब तक विदित बरी होते जब तक कि हमें इस बात का ज्ञान न
हो कि उस काल के विचारों का आरम्भ कब से ह जब तक कि इस बात का निश्चय न हो जाये कि उस समस्त काल
का प्रेरक प्राचीन विचारों को पलट देने वाला कौन-सा सिद्धान्त था।

यह एक माना हुआ सिद्धान्त है कि स्थित वस्तु की अपेक्षा सुस्म वस्तु अधिक शक्तिशाली होती है और यह
इसलिए कि सूक्ष्म वस्तु स्थूल के भीतर प्रवेश करके भी कार्य कर सकती है। विदुत् सबसे शक्तिशाली वस्तु है, इस तथ्य
को कौन व्यक्ति अस्वीकार कर सकता है। कारण स्पष्ट है कि विदुयुत् प्रत्येक प्राकृतिक पदार्थ के भीतर व्यापक हो रही है
और इसलिए विशाल से विशाल पहाड़ी तक को एक पत्र में चकनाचूर कर सकती है। यदि हम इसी सिद्धान्त को आंखों
के सामने रखकर चेतन जगत् ॥ अवलोकन करे तो वहां भी स्थूल और सूक्ष्म का ही सम्बन्ध प्रतीत होगा । हमारी पृथिवी
पर सब से अधिक पूर्ण रचना मनुष्य की है और इस रचना की खोज करने से विदित होगा कि इन्द्रियों के गोलक, उदाहरणतया
कारों के प्रेम, आंखों की पुतलियां, रसना का साधन जिया और इसी प्रकार अन्य गोलक सब के सब,स्कूल हैंऔर इसीलिए
चेष्टरहित हैं। उनकी अपेक्षा उनके भीतरी नियम अर्थात् सुनने, देखने और रस लेने आदि की शक्तियां अधिक महान् हैं।
इन सब की अपेक्षा मन जो कि इन सब को चेष्टा देता है अधिकतर शक्तिशाली है और इस शक्तिशाली मन से भी बुद्धि
जो कि ज्ञान प्राप्त करने का साधन है, अधिक सेक्सी और इसीलिए अधिक शक्तिशाली है। इस मोटे उदाहरण से स्पष्ट
विदित हो जाता है कि वेतन जगत् को जितनी चेष्टा ज्ञान का एक सिद्धान्त दे सकता है उतनी चेष्टा और कोई सिद्धान्त नहीं
सकता जैसा कि पवित्र वेद ने भी कहा है-
‘सा विश्वायु स विश्वकर्मा सा विश्वधाय:*
| (यजुर्वेद अ० १, ० ४)

अघति वही (सत्यज्ञान) समस्त जीवन, समस्त कर्म और धारणा का मूल सिद्धान्त है।