कलकत्ता में पधारे और संस्कृत भाषा में प्रचार आर किया तो गण। । । । (मानित जनों ने भी उनके।
बनाया वतीनन । पयस किया जाना न रहे। विदारण।।।। आसारजन्न ।
कुत्ता कभी मित्रता के नाते बता दिया करते ॥ धारण गरिश के सामने ऐसे गान्त बताना निरर्थक समझते ।।
स्वकधित तथा स्वलिखित आत्यकत्तातों की कहानी-रगामी जी ने जब सन् १८७५ में पूना और बना।
आर्यसमाज की स्थापना की तो वहां के कई विद्वान सज्जनों ने उगतति जानने का यत्न किया। चिकितने दिनों
भाषा बोलने लगे थे और व्याख्यान भी दिया करते है लोगों के बार-बार अनुरोध पर एक दिन उनहांने अपने जीवन
पर ४ अगस्त सन् १८७५ को व्याख्यान दिया और उसी वर्ग मराठी भाषा में प्रकाशित हो गया। मन ठरा भाष्य
मराठी से हिन्दी में पंडित गणेश रामचन्द्र और मलाशय श्रीनिवास राव जी * से कराया।
फिर अप्रैल, सन् १८७९ में जब कर्नल ऑक्ट साहब स्वामी जी से मिले तो उनके अनुरोध करने पर स्वामी
जी ने अपना ओवन चरित्र लिखने की प्रतिज्ञा की और तदनगर हिन्दी में लिखकर समय-समय पर भजत रहे ।
यासोफिस्ट’ नवम्बर व दिसम्बर १८८० के अंको में प्रवेशित होतारहा ।*जो हिन्दी लिखकर स्वामी जी ने भजी उठी।
एक प्रीति ला0 मथुरा प्रसाद मंत्री आर्य समाज अजमेर और दूसरी पंडित छगनलाल श्रीमाली भूतपूर्व कामदार रियासत मग्दा
किशनगढ़ निवासी के पास से प्राप्त हुई।

‘भारतसुदेशाप्रवर्तक’ पत्रिका फरूखाबाद, ‘आर्यसमाचार’ मेरठ, दयानन्द दिग्विजाक प्रथम भाग, कुछ दिनकर
आर्य अखबार* बम्बई, ० दलपत राय एम० ए० द्वारा लिखित उर्दू जीवनचरित्र ,शीजनेरेटर आफ दी आय्याव
और ‘पताका’ अखबार कोलकाता-इन सभी ने ‘थियोसोफिस्ट’ की नकल की।४ अगस्त, सन् १८७५ के व्याख्यान ।
किसी ने हाथ भी न लगाया और न उन्हें उसका ज्ञान हुआ।

इस आत्मवृतान्त के सम्पादन की हमारी शैली-चंकी मूल प्रति केवल तीन हैं अर्थात् पूना का व्याख्यान ।
थियोसोफिस्ट’ पत्रिका तथा हिन्दी कापी, हमने तीनों को बड़ी सावधानी के साथ नियमित रूप दिया। इसमें एक-एक
स्वामी जी का है परंतु नियमित रूप हमारा दिया हुआ है। हमने नियमित रूप देने के अतिरिक्त और कोई अधिकता जी
की।

स्वामी जी के जीवनचरित्र सम्बन्धी वृत्तान्त जानने के लिए आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब के कथनानुसार ३ दिसम्ा-
१८८८ से सन् १८९२ तक इस संवाददाता ने निरन्तर खोज की और १८९६ के अन्त तक समय-समय पर भिन्न-दित
नगरों में जाकर लोगों से वक्त में जाना ।

कुल, नाम व जन्मस्थान के विषय में अनेक साक्षी-काठियावाड़ में जो स्वामी जी की जन्म-भूमि है. डेढ़ गन
के लगभग फिरता रहा और राज्य की सहायता से उस प्रदेश के सारे ग्राम एक-एक करके छान डाले ।

पिछले वर्ष दीवाली के अवसर पर अमृतसर में एक महात्मा साघु (जिनकी आकृति स्वामी जी से मिलती थी और
जिनके विषय में लोगों में प्रसिद्ध था कि वह स्वामी दयानन्द जी का भाई है, जिनका नाम गोविन्दानन्द सरस्वती है और
जो छ वर्ष तक स्वामी जी के साथ गंगातट पर विचरते रहे) से भेंट हुई। उन्होंने कहा कि स्वामी जी के पिता का नाम
अम्बाशंकर”औदीच्य ब्राह्मण था । पंडित ज्वाला दत्त'””कान्यकुब्ज और मिस्टर रामदास छबीलदास बैरिस्टर ऐटत
बम्बई और कई अन्य सज्जनों, जैसे कि ठाकुर मुकन्दसिह साहब रईस,छलेसर के द्वारा विदित हुआ कि स्वामी जी के
जन्म-नाम मूलशंकर था। १८७६ के अन्त में देहली में जो शाही दरबार हुआ था उसमें काठियावाड़ के कछ रईस