भागलपुर में ईसाइयों तथा ब्रह्म समाजियों के साथ धर्माचा

(कार्तिक बदी, संवत १९२९, तदनुसार २०, अक्टूबर, सन् १८ २)

*३० अक्तूबर सन् १८७२.रविवार, ६ बजे सायंकाल को भागलपुर पहुंचे। स्वामी जी आगे आगे जाते थे
ने पीछे थे। वहां जाकर सात बजे कार्यकाल के समय गंगा के तट पर स्थित बुढेश्वरनाथ महादेव के मन्दिर में
जय भी समोप था । कुछ काल वहां ठहरे; फिर आकर कहा कि यहां से चलो। फिर आध कोस दक्षिण में जाकर,
डल्ला शुजागंज के बाहर रेलवे स्टेशन से दक्षिण की ओर एक छटपटी तालाब है, वहां गये, शुजाअगंज से
आठ आने की पूरी और मिठाई ले ली । आठ बजे रात के हम सब तालाब पर पहचे वहां तालाब के समीप पश्चिम की ।
शिवालय और दो कोठरियों तथा एक कमरे वाला मकान था परन्तु उस समय उसमे कोई न था। यह मकान
दलाल ब्राह्मण शाकद्वीपीय का था। हमारे ठहरने के कुछ समय पश्चात् मोहनलाल ब्राह्मण भी दो चार अन्य मनुष्यों-सहित
न आ वहां आ गया। स्वामी जी को टहलते देखकर दंडवत् किया और तुरन्त एक लोटा जल तथा बिछौना आदि
वा दिया। तत्पश्चात् संस्कृत में स्वामी जी उससे वार्तालाप करते रहे। वह अच्छा पण्डित और संस्कृत जानता था ।
1 बडे गत तक उसकी स्वामी जी से बातें होती रहीं । तत्पश्चात् वे सब लोग अपने-अपने घर चले गये और हम लोगों
ने भी विश्राम किया।

स्वामी जी प्रातः:काल ४ बजे उठे और शौच तथा स्नान से निवृत्त होकर ध्यान में लग गये । ६ बजे हम भी अपनी
आवश्यकताओं से निवट कर स्नान कर अष्टाध्यायी का पाठ करने लगे । तत्पश्चात् बहुत से ब्राह्मण और पंडित इकड़े होकर
सभा होने लगी। स्वामी जी मूर्तिपूजा का खंडन करते रहे और अन्य सब पंडित सनते रहे 1 किसी ने भी कोई बात नहीं की।
उनचे संस्कृत सुनकर ही लोगों के होश उड़ते थे। अग्रवाल जाति का एक बनिया दो-तीन दिन तक एक लोटा दूध और
मीधा (अनादिक) भिजवाता रहा। उसकी इच्छा इसमें यह थी कि मेरे घर में पुत्र हो । स्वामी जी ने दो दिन तो लिया, तीसरे
दिन फेर दिया और कहा कि स्वार्थ वाली भिक्षा हम नहीं लेंगे। हम ईश्वर नहीं कि तुमको पुत्र दें और तुम्हारा अन्न खायें।
गश्पि उसने यह अभिप्राय अपना अभी तक प्रकट नहीं किया था परन्तु स्वामी जी ने उसके बतलाने से पहले बतला दिया।
वह आटा, दूध मीठा घी बहुत भेजता था। स्वामी जी ने उसका सीधा लौटा दिया। उससे पहले तीन-चार दिन मोहनलाल
पंडित के यहां से भोजन आया और फिर विभिन्न लोग भेजने लगे। जो कोई मारवाड़ी आदि आता तो कुछ रुपया और
कुछ अन्य पदार्थ दे जाता था परन्तु वहां एक आचारी था, वह सब लोगों को स्वामी जी के दर्शन और उपदेश सुनने से
एक था परन्तु किसी ने उसका कहा न माना और सब लोग बराबर आते रहे। लोगों ने आचारी को शास्त्रार्थ के लिए कहा
परन्तु वह बिलकुल न आया और कहता रहा कि काशी में उसने महादेव को निन्दा की है, यहां भी लोग इसकी ओर
न लगे, यह बहुत बुरा हुआ। विवश होकर वह नगर छोड़कर भाग गया। उसका नाम सूरजमल आचारी अथवा ऐसा
हैं कुछ दा ।

स्वान भागलपुर में जब एक सप्ताह के लगभग व्यतीत हुआ तो एक दिन जब कि हम रसोई बना रहे थे तो
जीने एकाएक हमसे कहा कि ‘तव पिता आगतः’ अर्थात् तेरा पिता आ गया और हम तुमको कहते थे कि पिता से
आओ परन्तु तुमने नहीं माना; जिस पर उनको कष्ट हुआ। हमने जब बाहर आकर देखा तो उस समय तक
एे दिल नहीं आये थे परन्तु इसके आध घंटा पश्चात जब रसोई क
बन {चुकी थी, हमारे पिता जी आ गये और आकर स्वामी
र किया और म्झे देखकर रोने लगे। स्वामी जी को भी दु:ख हुआ और कहा कि अपने पुत्र को तुम ले जाओ,
हरकर साधुओं की पत्ती चेला बनाने वाले नहीं है कि आपको दुख देवे। इस पर हमारे पिता जी कुछ न बोले । फिर इसके