क्रमित सलाह को मानने के लिए सदा उठत रहते थे, बंगाली भद्रपुरमा का कहना मानका ‘भाण ॥ ध्या
और अपना स्वीकार किया गया टामीन ऑर्ग नाक स्वामी जय । ।
तो बस पहनते से । हमने कारण पूछा है कि उब हम कलकते गये हा प्रसाधया ने आरोप किया।
५१. आगरा विद्वान् जगत् ऊषा में वसा पहनने में बस नि? हमने गौर किया।

कोलकाता में क्या-क्या?

स्वामी जी द्वारा कलकता निवास की स्मरणीय घटनाओं को स्वयं वर्णन । वा केशवचन्द्र का स्वर परिया
वेट के ईश्वर होने में यृद्तियां पं० तारावरण शास्ार्य करने नहीं आय-फागद निवासी ठाकरदार वैश्य
बताया कि हमने स्वामी जी के मुख से कलकता का पतांत सुना था। स्वामी जी ने बताया था कि जब पेशवचन्द्र सेन यो
पास आये और बातचीत ने सगी तो बातचीत की समाधि पर उन्हींने प्रश्न किया था कि आप केशवचनद्र सेन से ।
१? वामी ने कहां मिला। तो वही बाहर गये हुए थे, आप उनसे कब मिले?; रागी जीने
में मिला । दो-तीन बार हेर फेर करने के पश्चात् स्वामी १rift तुम ही केशवचन्द्रशेन ।। १। ।
मुझे कैसे पहचाना ? स्वामी जी ने कहा कि यह बातचीत दसरे की हो ही नहीं सकती। उस दिन से उन परस्पर बत
पी1ि0 गई और फिर वावर नियति आते रहे और घंटों धार्मिक वार्तालाप रोता रहा।

। थारी ने बताया था कि हम यह प्रश्किया कि तीन मजहब इस समय ससार में सब से यह ए१ (ग)
बाइबिल कुरान और वेद(पर आधारित) । अपने-अपने मजहब को रपी परमेश्वरफृत कहते हैं, किसको सत्य माने ? हमरे।
वेद को छ युक्तियों से ईश्वर सिद्धि था (मुझे सब र्मरज नहीं रही परन्तु एक याद है) कि कुरान और बाइबिल में
सब प्रकार के द्रगड़े, किस्से कहानियों और मतों का खंडन पाया जाता है परन्तु वेद में उपदेश के अतिरिक्त बोई गई।
नहीं, इसलिए वह (वेद) इन सब से अधिक सज्जा है।

कॉलोनी के विषय में स्वामी जी ने इस प्रवार लिखा है कि जिस स्थान में में ठहरा था उनका नाम श्रीयृत
जतीन्द्र मोहन ठाकुर तथा श्रीयुत राजा सीरिन्द्रमोहन टाकुर है। संवत् १९२९ में मेरे निवासकाल में हुगली नगर के
पर वो भाटाटा (भटपल) Bाग के नियासी पडित ताराबरण तर्करी(परन्तु आजकल थे पडित की श्रीयत काशीनरेश
के पास रहते हैं के पास तीन बार जा-जाकर यह प्रतिज्ञा की थी कि आज अवश्य शास्त्रार्थ करने को लगे। ऐसा ही।
तीन दिन कहते रहे परन्तु एक बार भी शास्त्रार्थ काने न आये। इससे बुद्धिमान् लोगों ने उनकी बात झूठ जान ली।

स्वामी विशुद्धानन्द के घ्यायी और उनके अतिविरोधी विद्वान् मोतीराम मिर्जपर निवाससी ने गर्णन किया।
सामी जी के पास कोलकाता में प्राय: बंगाली सम्भ्रान्त आया करते थे। वो एक ब्राह्मणभा थी, जो आदित्यवार को
लगती थी। ठाक राधा मुखिया लोग आया करते थे। वहां के पंडित तारानात तर्कयाचा्यति भट्टावार्य तोगों को कहते थैं

कि हमारे सामने स्वामी जी की वाक (बोलती। बन्द हो जायेगी । वामी जी ने लोगों को प्रेरणा करके उन्हें बलाया। आत
ही उन्होंने 5० प्रश्न किये जिनको वह अपने विचार से बहे कटित और निरुतर करने वाले जानते थे परन्तु स्वामी ने
२२-२३ उन में सवा उत्तर दिया। जब उन्होंने उनी ने तो खामी के पांव पर गिर पड़े। जगवत् १९३१
। म स्वामी जी यहा (मिर्जापुर) पधारे तो उन दिनों पति तारानाथ जी लखनठ जाते यामी जी के पास बाग में ।
स्वामी जी ने हमसे उनका परिचय कराया और कहा कि यह तारानात हैं। हमने तारानाथ जी से बात की तो उने