आश्चर्य है, हमने जब प्रश्न किये थे तो विश्वास था कि पृथ्वीभर में कोई इनका उत्तर देने वाला नहीं परन्तु उन्होने क्षण
भर में उत्तर दे दिये । उस दिन से हम इनसे अति प्रसन्न हैं ।

दो महापुरुषों द्वारा एक दूसरे की अनभिज्ञता पर खेद प्रकाश-कहते हैं कि बह्मसमाज के बड़े प्रसिद्ध अध्यापक
बाबू केशवचन्द्र सेन ने स्वामी जी के अंग्रेजी न जानने पर खेद प्रकट किया था और कहा कि यदि वेदों के विद्वान् अंग्रेजी
जानते होते तो इंग्लैंड जाने के लिए मेरे मनचाहे साधी होते परन्तु चूंकि प्राचीन दर्शनों के विद्वान् के मन में अभिमान न वा,
इसलिए उसने अंग्रेजी के श्रेष्ठ भारतीय व्याख्यानदाता को उत्तर दिया कि मैं भी ब्रह्मसमाज के नेता के संस्कृत न जानने पर
वैसा ही खेद प्रकट करता हं जो कि एक सभ्य धर्म, भारत के लोगों को उस भाषा (अंग्रेजी) के द्वारा सिखलाने का दावा
करता है, जिसको वह पराया: समझ भी नहीं सकते।

हुगली का वृत्तांत (१ अप्रैल, सन् १८७३ से १५ अप्रैल, सन् १८७३ तक)
मंगलवार, १ अप्रैल सन् १८७३ तदनुसार चैत्र सुदि, संवत् १९३० को स्वामी जी ने हुगली में आकर प्रसिद्ध
जमीदार वृन्दावन चन्द्र मंडल के बाग की कटी में निवास किया आते ही नगर में शोर मच गया। चारों ओर से लोग आने
आरम्भ हो गये।

पादरी को निरुत्तर किया-उस समय हुगली कॉलेज के अध्यापक, ईसाई मत के प्रसिद्ध समर्थक् रैवरेंड
लालबिहारी थे। वह स्वामी जी के पास विचार के लिए गये । वर्णभेद पर विचार हुआ जिसमें थोड़े समय के पश्चात्
पादरी साहब ने निरुत्तर होकर हार मान ली और कहा कि निस्सन्देह ऐसा समझना मेरी भूल थी।

बंग-साहित्य जगत् के प्रसिद्ध व्यक्ति बाबू अक्षय चन्द्र(अक्षय कुमार घोष) ने बंगला जीवनचरित के लेखक
देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय को लिखा है कि हम सबके सामने चूचडा नामक स्थान पर स्थित मंडल बाबुओं के घर में
स्वामी जी ने दोपहर को भाषण दिया । उस समय भटपल्ली (भटपा) के कई एक पंडित उपस्थित थे। स्वामी जी के सरल
संस्कृत-भाषण को सुनकर मैंने मन में सैकड़ों वार उस दिन उनको प्रशंसा की। मेरे हदय में पहले यह विचार न था कि ऐसे
कठिन विषय पर भी ऐसी सरल संस्कृत भाषा में वर्णन किये जा सकते हैं। उनके कथन को सब लोग समझते थे और
भटपल्ली के रहने वाले रामचरण से संध्या के समय शास्त्रार्थ हुआ था और वह मंगलवार का दिन था।

आठ अप्रैल, सन् १८७३, मंगलवार को हुआ हुगली-शास्त्रार्थ ८७|
पं राधाचरण पराजित आजीविका चले जाने की आशंका से वे सत्य नहीं कह सके–’रविवार ६ अप्रैल, सन्
१८७३ को यहां के रईसों ने एक सभा की और उसमें स्वामी जी से व्याख्यान दिलवाया। बहुत से लोग सनने के लिए
आये। स्वामी जी व्याख्यान दे रहे थे कि इतने में पंडित ताराचरण भी आ पहुंचे। उनसे बाबू वृन्दावनचन्द्र आदि लोगों ने
कहा कि आप भी सभा में आइये और जो इच्छा हो सो कहिये । पंडित जी सभा में तो न आये परन्तु उस मकान के ऊपर
चढ़कर दूर से गरजने लगे। उस समय उनके सभा में न आने पर ऊपर ही ऊपर गरजने से सब लोगों पर प्रकट हो गया कि
पंडित जी बस केवल देखने और कहने के ही हैं, जानते कुछ भी नहीं, क्योंकि जो कछ भी जानते होते तो सभा में आने से
क्यों डरते ? फिर मौ बजे सभा समाप्त हो गई।

1.पं0 तारानाथ तर्क वाचस्पति द्वारा ७० प्रश्न करने तथा स्वामी जी द्वारा उनके उत्तर का वर्णन श्री स्वामी जी द्वारा स्वयं कथित
जीवन चरित में नहीं है। हां यही उल्लेख है कि ताराचरण तर्करन एक बार भी शास्त्रार्थ करने नहीं आये । ये पण्डित तारानाथ तर्कवाचस्पति
संस्कृत के वृहत्कोश वाचस्पत्यभिधान’ के रचयिता प्रतीत होते हैं ।—सम्पा