पश्चात् हमने उन्हें पांव धुलवा कर रसोई खिलवाई। फिर हम पिता जी को स्वामी जी के पास छोड़कर, वहा सेवेत
दूर बरारी में, जहां हम पहले पढ़ते रहे हैं, अपने एक मित्र से मिलने गये । बरारी में हम पण्डित अभयराम जी बनारस निवा
संस्कृत अध्यापक गवर्नमेंट स्कूल भागलपुर और पार्वतीचरण सेक्रेटरी स्कूल से मिले और सब वृत्तांत सुनाया। इस पर वह
लोग कहने लगे कि स्वामी जी को आप यहां ले आइये । हमने कहा कि आप चलिये और दर्शन कीजिए। वहां चला
जैसी उनकी आज्ञा होगी करेंगे। अत : वे दोनों और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति आय और स्वामी जी को बग्बी में चताक
बरारी में ले गए । वहां स्वामी जी ने पार्वतीचरण की फलवाड़ी में डेरा किया। हमारे पिता भी साथ गये और तीन दिन तक
रहने के पश्चात पंडित अभयराम आदि लोगों को समझाने से कि ‘यदि यह स्वामी जी के पास रह जावेगा तो अच्छा किदम
हो जायेगा, तुम घबराओ मत, सन्देह मत करो वह चुप कर गये। स्वामी जी ने कुछ न कहा। इसी प्रकार अधिक समझाने
से हमारे पिता समझ गये और तीन दिन के पश्चात पांच रुपया रेल का किराया लेकर स्वदेश को लौट गये। हम वहीं रहे ।

स्वामी जी वहां प्रतिदिन संस्कृत में उपदेश करते रहे और सैकड़ों हजारो मनुष्य नित्य एकत्रित होते रहे। यहां
तक वहां रौनक होती थी कि हलवा पूरी, तंबाकू वालों की दुकानें लग जाती थी । इक्का बग्घी, गाड़ी प्रतिदिन वहां एकत्रित
रहते थे। पंडित अभयराम जी ने बर्दवान के राजा की कोठी पर जाकर उनको स्वामी जी के विस्तृत वृत्तांत से परिचित किया,
जिस पर राजा साहब ने चार नैयायिक पंडितों को स्वामी जी के पास भेजा। पंडित लोग १० बजे के लगभग आये। वह
स्वामी जी के भोजन करने का समय था। पंडितों को आसन देकर बिठाया गया। स्वामी जी ने भोजन करके कछ समय
विश्राम किया, फिर दिन के एक बजे से बातचीत आरम्भ हुई। वे पंडित न्यायशास्त में बोलते थे और स्वामी जी उनका उत्तर
देते थे। पांच बजे तक उनसे बातचीत होती रही । फिर पंडित लोग चले गये और कह गये कि हम प्रात: राजा साहब को
भी आपके दर्शनार्थ लावेंगे। पंडितों ने यहां से राजा साहब के पास लौटकर स्वामी जी की बहुत स्तुति की और उन्होंने दुई
निश्चय किया कि ४ बजे साइकिल को हम अवश्य चलेगे। उस दिन प्रात:काल ही से ३०-४० यूरोपियन तथा स्वदेशी
पादरी लोग आ गये और कुछ मुसलमान मौलवी भी। स्वामी जी उनसे भी संस्कृत में बोलते रहे। वह भी यथाशक्ति
समझते रहे । स्वामी जी का उपदेश सुनकर एक बंगाली ब्राह्मण जो ईसाई हो गया था, बहत रोने लगा और दुःख प्रकट
किया कि यदि आप जैसे पंडित लोग हमको पहले मिलते तो हम ईसाई न होते, क्योंकि जब हम स्कूल से पढ़कर और वहां
के पादरियों के आक्षेप सुनकर घर जाकर पंडितों से पूछते तो कोई भी इन प्रश्नों के सन्तोषजनक उत्तर न देता था। यदि
हमको उत्तर मिलता तो हम ईसाई न होते।

उसी दिन ४ बजे साइकिल को राजा साहब बर्दवान बग्घी पर पधारे । कर्सियां वहां पहले ही बहुत एकत्रित थी।
और इसके अतिरिक्त महाराजा साहब ने भिजवा दी थी। महाराज के साथ वे चारों पंडित भी थे। उनमें से एक पंडित ने
पहले आकर स्वामी जी को सूचना दी, तत्पश्चात् राजा साहब पधारे और कुछ समय तक स्वामी जी की बातें पादरिया के
उत्तर में सनी परन्तु स्वयं कुछ न बोले। उस समय ईश्वर साकार हैं या निराकार, इस विषय पर बातचीत थी। बातचीत
समाप्त होने के पश्चात् राजा साहब चले गये और पंडितों को आज्ञा दे गए कि स्वामी जी हमारे मकान पर ले आओ।
प्रातःकाल पंडित अभयराम और एक दो पंडित लोग आये और स्वामी जी को कहा कि आपको राजा साहब ने बुलाया है,
वहां चलिए । स्वामी जी ने कहा कि यदि वह ऐसा ही एकान्त और स्वच्छ स्थान हो तो हम चल सकते हैं। नगर के बाहर
हवादार स्थान है । जहां कोलाहल हो और एकान्त न हो वहां हम नहीं जा सकते । तुम पहले जाकर स्थान निश्चित करो ।
स्वामी जी के कथनानुसार पंडित लोगों ने जाकर देखा परन्तु उस एक कोठी के अतिरिक्त जिसमें बहुत प्रकार की गड़बड़
फिर कोई मकान पराट ने आया। अंततः एक मस्जिद निश्चित की जिसके साथ का भी थी ।1स्वामी जी ने कहा कि
। कब्रिस्तान में नहीं रहना चाहते, हम मुद्दा नहीं है । राजा साहब को यहां आने में क्या आपत्ति