राजा साहब हृदय से ईसाई मत की ओर झुके हुए थे। उनकी रानी की भी यही इच्छा थी कि स्वामी जी अवश्य
पति मकान का समुचित प्रबंधन होने से स्वामी जी वहां न गये।

भागलपुर में वर्णभेद के रहस्य पर वार्तालाप
सना का वर्ण-विभाग समझाया-‘उसके दूसरे दिन स्कूल के हेडमास्टर साहब बंगाली, जो बहसमाजी

वयसमाजियों सहित लगभग तीन बजे दिन के आये और आकर अपने मत की चर्चा की। स्वामी जी नेल
तार पूर्वक उत्तर दिया और समझाया कि सब संसार के लोगों के साथ खाना ठीक नहीं और चारो वर्ण भी एक
अमरसर ठोकरे अन्यथा तुम्हारे कहने से वेद की आज्ञा भंग होती है, इसीतिए तुम्हारा कहना ठीक नही । बरत
रों और युक्तियां से उन्हें समझाया। इसी प्रकार रात के दस बजे तक उनसे बातचीत होती रही।
दूसरे दिन प्रात ब्रह्म समाज के लोग आये और वार्तालाप होता रहा।उसी दिन ४ बजे शाम के महाराज बर्दवान
पत्र और दंडवत करके बैठ गए। उस दिन भी महाराज बहुत समय तक सुनते रहे, कुछ न बोले परन्तु ब्रह्मसमाज के
अब सब प्रकार से निरुतर हुए तब कहा कि कलकत्ते के जो हमारे बड़े हैं वह यदि आपकी बात मान तें तो हम भी मान
के उस दिन महाराजा साहब और ब्रह्म समाजी सज्जन आठ बजे रात तक बैठे रहे । एक सुन्दर शामियाना भी वहां तन

तत्पश्चात दो दिन तक स्वामी जी वहां रहे। फिर कोलकाता जाने की इच्छा हुई। इस बार स्वामी जी कुल एक
मम तवरा रहे । भागलपुर के एक विद्वान् महाशय स्वामी जी से योग की क्रिया सीख त्यागी होकर चले गये थे। उनका
मुझे मरज नहीं रहा। उन्ही दिनों मेरे शरीर में ज्वर हो गया और स्वामी जी ने जाने की तैयारी कर दी। इतने में एक
इन विद्याद गजानन गौड़ मिर्जापुर की पाठशाला में पढ़ता था, वहां आया और स्वामी जी से मिला। स्वामी जी पहले
मे हो उसको जानते थे। मेरे जर के दिनों में उसने रसोई बनाई। स्वामी जी ने मुझे कहा कि तुम यहां रहो, कलकत्ते का
से अच्छा नहीं है। हम गजानन को लेकर कलकते जाते हैं, तुम मत जाओ। स्वामी जी ने मुझको अभयराम पण्डित और
पद इंच के सुपुर्द किया कि किसी बात कैसे कष्ट न हो और चिट्ठी डिटी सोहनलाल जी के नाम दी कि इसे फिर भर्ती
का से। इन उसके पश्चात एक मास तक भागलपुर में रहे फिर पटना चले आये। स्वामी जी मंगसिर पूर्णमासी तक
तर में रहे पोह बदी पड़वा, तदनुसार १५ दिसम्बर सन् १८७२ को रेल द्वारा कलकत्ता को प्रस्थान कर गये ।

| राजधानी कोलकाता में स्वामी जी का पधारना तथा अवस्थिति

(१६ दिसम्बर सन् १८०२ से मार्च सन् १८७३ के अन्त तक)

स्वामी जी को कोलकाता में बताने के लिए अधिक उद्योग श्री चन्द्रशेखर सेन बैरिस्टर ऐट ला ने किया। पहले
द्राव ठाकुर के पास गया । वह प्रबन्ध में असमर्थ थे और चाहते भी न थे। इसलिए वह सीरेन्द्रमोहन’ ** के
कय ।उ्होने भी पहले कोई अनुराग नहीं दिखता परन्तु जब दूसरे दिन चन्द्रशेखर सेन हवड़ा स्टेशन से स्वामी जो
र पहुचे व स्वामी जी ये देख सीरेद्रमोहन जी बड़े सत्कार से उन्हें अपने बाग में ले गये और वहां सब खान-पान
से दिया। एक गजानन विद्यार्थी मिर्जापुर स्वामी जी के साथ था, जो मन् पढ़ता था।

रस स्थान पर स्वामी जी ठहरे थे वह बैरकपुर ट्रंक रेड के सावटालागांव के समीप प्रमोद कानन नाम का
दसरा नाम निधान है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध समाचार पत्र इंडियन मिरर कलकता के ३० दिसम्बर, सन्
अब लिखा है कि एक बड़ा प्रवल मूर्ति मजाक हिन्दू अर्थात पण्डित दयानन्द सरस्वती, जिसने अभी कुछ