पहले बनारस के सर्वश्रेष्ठ पंडितों को एक सार्वजनिक शास्त्रार्थ में पराजित किया और अपने अन्य कार्यों से पूतों
बडी प्रसिद्धि पाई है कलकत्ता आया है और राजा ज्योतीन्द्र मोशन टैगोर के बाग के बंगले में निनयान नामक स्थान पर उ

है।

कलकत्ता में ब्रह्मसमाजियों की शंकाओं का निवारण
पंडित हेमचन्र चक्रवर्ती, बंगाल के जिला चौबीस परगना के दक्षिणी बारीसाल निवासी, बसमाज के उपदेशक
ने वर्णन किया कि इन दिनों हम कोलकाता की कानपुर की राजबाड़ी में थे । सुना कि एक बड़ा पंडित, संस्कृत और वेदन
महाराजा साहब के बाग में आया है। दोपहर के पश्चात् बहुत से लोग वहां पण्डित जी के साथ शास्त्रार्थ और विचार के
लिए एकत्रित होते हैं।

श्री चक्रवर्ती के प्रश्न तथा उनके उत्तर-‘एक दिना हम भी देखने के लिये गये और इस प्रकार प्रश्न किया
प्रश्न-जाति भेद है या नहीं?
उतर-मनुष्य एक जाति, पशु एक जाति पक्षी एक जाति-जातिभेद इसी प्रकार है।
उनके इस उत्तर को सुनकर हम मौन हो गए। तब स्वामी जी ने कहा कि तुम्हारा प्रश्न कदाचित् यह है कि वर्णभेद
है या नहीं? हमने कहा कि यही हमारा अभिप्राय है। स्वामी जी ने कहा कि निस्सन्देह वर्णभेद है। जो वेदज्ञ और पण्डित
है, वह ब्राह्मण, जो उससे न्यून और युद्ध रत हैं और ज्ञानवान् हैं वे क्षत्रिय, जो व्यापार करते हैं वे वैश्य और जो मूर्ख वे शूद्र
है। और जो महामुर्ख वह अतिशूद्र हैं। तब हम बहुत प्रसन्न हुए और इसी से स्वामी जी पर हमारी भक्ति आई ।

दूसरा प्रश्न-हमारा यह था कि ईश्वर मूर्तिवाला साकार है या निराकार ? स्वामी जी ने उत्तर दिया कि वर्तमान
संस्कृत पुस्तकों में तो बहुत से ईश्वर (बताये) हैं। तुम कौन सा ईश्वर चाहते (पूछते) हो, सच्चिदानन्द आदि लक्षण वाला
चाहते (पूछते) हो तो वह ईश्वर एक है और निराकार है।

हमने पूछा कि वह जो संसार का स्वामी है उसका आकार है या नहीं? स्वामी जी ने उत्तर दिया कि उसका आकार
नहीं है। वह तो सच्चिदानन्द है, यही उसका लक्षण है।

अष्टांग योग से ईश्वर मिलन-‘हमने चौथा प्रश्न यह पूछा, कि उसके मिलने का क्या उपाय है ? स्वामी जी ने
बतलाया कि बहुत दिन तक योग के करने रूपी कर्म (योगक्रिया) से ईश्वर की उपलब्धि होती है।

हमने पूछा कि वह योग किस प्रकार का है ? उस पर स्वामी जी ने अष्टांग योग की बाते हमको लिख दीं। वह
कागज हमारे पास है और मौखिक इस प्रकार समझाया कि जब रात तीन घड़ी (शेष) रह जाये, उस समय उठकर मुंह-हाथ
धो, पद्मासन लगाये (उसका नमूना भी बतलाया)। जहां तुम्हारी इच्छा हो बैठो; परन्तु स्थान हो निर्जन । गायत्री का अर्थसहित
ध्यान करो और वह अर्थ भी लिख दिया जो अब तक मेरे पास विद्यमान है। यह पहले दिन की बात है।
सांख्य दर्शन निरीश्वर नहीं; दर्शनों का परस्पर कोई विरोध नहीं-‘फिर हम नित्य जाने लगे। एक दिन हमने ।
पूछा कि सांख्य के कर्ता के लोग नास्तिक कहते हैं, सांख्य दर्शन को निरीश्वर कहते हैं और उसमें ईश्वरासिद्धे: *** ऐसा
सत्र भी है। उससे निरीश्वर की बात विदित होती है कि उसके मत में) ईश्वर महीं है। क्या यह बात ठीक है कि वह दर्शन
निरीश्वर है, अर्थात् ईश्वर को नहीं मानता ?