म्याना ने कहा कि सांख्य निरीश्वर नही है जो जो लोग रियो बी टीका कर आर Vष्ट लागा
कोरी नवे ऐसा समझते हैं. अन्यथा पदो के यो से साकार निरीश्वर पहीं जान पड़ते। हमने पूछा
कि क य कसा? ते लगे कि हम दे तब तम्हारा स्देह टूर हो जायेगा । और साख्म में
कुंश्वरासद्ध: सूग् पूर्वपद्य में आगे इसकाउना है। यदि साख्य वाला पास्तिक होता तो वह इन बातों को जमानत वा
पुनर्जन्म मानता है, वेद मानता है, परलोक मानता है योग मानता है आश मानता है फिर तो वह किसी भी प्रकार निरोश्चर
रासाला जन्म नुमा के प्रवपदा पर में पड़ गये अन्यया कोई दर्शन किलो दर्शन का विरोधी नहीं।
कारण म छ.दना की उत्पति हई, न्याय (दर्शन) परमो का मोमासा दर्शन कर्म का सांख्य दर्शन) तन्यो ।
ई मेल का, पाताल (योग दर्शन) ज्ञान विहार और बुद्धि वैशेषिक (दर्शन) मान का निरूपक है और वेदान्त (दर्शन)
क न बतलाता है. इतरा शास रस्तिक नहीं

यज्ञोपवीत करना आवश्यक ै, मूर का तोड़ दे-एक दिन हमने पूज कि यज्ञोपवीत पहनना चाहिए या नहीं
क्योंकि दिवसम्प में यगोपवीत छोड़ देने की चर्बी उठी थी क्योंकि बा केशवचन्द्र सेनने इन दिनों यज्ञोपवीत ।
के रखने पर वितरित (और करा था कि जो बसरमाजी लोग यज्ञोपवीत रखेगे वे बड़े पापी तथा कपटी हैं। हमने
हुमलिये स्वामी जी से पूछा था कि रखना आवश्यक है या पहीं या पेकना अचधा है।

स्वामी जी ने हमको कहा कि तुम ब्राह्मण हे तुम्हरे लिये जोपवीत रखना बहुत अच्छी बात है। जो मूर्ख
ब्राह्मण है उसका प्रीत तोड़ दो और जो पंडित ज्ञानी खेटा, थार्मिक लोग हैं उनको अवश्य यज्ञोपवीत पहनना
चाहिये।’ इसलिये उस समय से आज तक हमने झोपवीत नहीं छोड़ा। यह हम पर बड़ा उपकार किया। इन दिनों बहुत
लोग स्वामी जी के पास इस बात के पुणे के लिये गये और उनकी कृपा से पतित होने से बच गये। यज्ञोपवीत नही त्यागी
हमारी भांति पता है।

एक दिन स्वामी जी ने हमको कहा कि तुमने सब उपनिषद् पता है? हमने कहा कि नहीं, योड़ा-योड़ा पढ़ा है।
अन्त में कहने से हमने उनसे ही पढ़ना आरम्भ किया और जब यहां से चले गये तो कानपुर में उनसे जाकर मिशे फिर
यहां से फर्रुखाबाद साप्त गये। इन दोनों स्थानों पर कई गास तक साथ रहकर हमने स्वामी जी से छ: उपनिषदे पती ।।
मिलने व धर्म-चर्चा करने वाले प्रतिष्ठित महानुभाव-पण्डित महेशचन्द्र न्यायरल व पण्डित तारानाथ
हुक वाचस्पति आदि शासी प्राय: जाया करते थे।बाबू केशवचन्द्र सेन राजनारायणजt कसु वदिजेन्रनाथष ठाकर “* सदा
दयानन्द का पस लिया करते थे। राजा सीरेन्द्रमोडन ठाकूर और देवेन्द्रनाथ ठाकुर भी प्रायः बैठे रहते थे। जो लोग उनसे
मितने को जाते वह केशवचन्द्र और वनस्पति’ ** को तो प्राय: वहां बैठे हआ देखते थे और शेषनाथ यद्योपाध्याय, सिटी
कालिज कलकता के पत्र और बिन्द्र मित्र”शरना मोहल्ला शिमला कलकत्ता भी स्वामी जी के उद्देश्य से बहुत
प्यार करते थे ।’

प्रातःकाल से २ वे तक की दिनचर्या–प्रात:काल से लेकर दो बजे तक किसी से भी न मिलते थे इसलिए कोई
आता नहीं था। उस समय स्वामी जी अपने योगाभ्यास प्रमाण तवा विचार में संलग्न रहते थे और ४ बजे के पश्चात् बड़े-बड़े
पंडित लोग एकत्रित होते और स्वामी जी सबके संशय निवारण करते थे। उनके उपदेशों से सैकडो-हजारो व्यक्तियों को
लाभ पहुंचा।

होम मूर्ति पूजा का रूप नहीं है-स्वामी जी का बा० केशवचन्द्रसेन के साथ पुनर्जन्म पर शास्त्रार्थ हुआ था और
इस विषय पर भी कि अईतवाद वेद प्रतिपादित हैं या नहीं ? राजनारायण वसु के साथ होम के विषय पर शास्त्रार्थ हुआ