,या वसु ने माँ को मूर्तिपूजा का एक दूसरा रूप कहा था। दयानन्द जी ने उत्तर दिया कि ब्रह्म स्मरण करने के
जिस कार्य का अनुष्ठान होता है और विशेष रूप से वह जो समस्त जगत् तथा साधारण जनता के सुख के लिए
होता है उसको हम मूर्तिपूजा का अंग नहीं मान सकते । इसको सुनकर वे फिर कुछ न बोले i
हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करने के लिए महाभारत तक रचित ग्रन्थों का आश्रय
चाहिए-राजनारायण बसु ने अपनी बनाई पुस्तक ‘हिन्दू धर्म की श्रेष्टता’ स्वामी जी को सुनाई थी । सुनने के पश्चात
बोले कि हिन्दू धर्म को श्रेष्ठता का प्रतिपादन करने के लिये पुराण और तन्त्र को प्रमाण मानना युक्तिसंगत नहीं । शाह
से(महा) भारत तक (के ग्रंथों को प्रमाण मानना चाहिये और ऐसा ही हम मानते हैं।’
कलकत्ता में धर्म-प्रचार के लिए पधारने पर अद्भुत आन्दोलन-ज्ञानेन्द्रलाल राय, एम०ए०, वीot
सम्पादक-पताका’ बंगला लिखते हैं-*स्वामी दयानन्द जब धर्मप्रचार के निमित कलकत्ता आये थे तब चारो और
बहुत ही आन्दोलन होने लगा। क्या बच्चा क्या बडा क्या स्ियां-सभी उनके दर्शन और उनके मुख की बात पर
निमित्त आतुर थे। उनके व्याख्यान देने की शक्ति और तर्कशक्ति तथा शास्त्रों के पूर्ण ज्ञान को देखकर सब को
आश्चर्यचकित होने लगे। लोग दल के दल (बांधे) उनके समीप धर्मजिज्ञासु होकर गये ओर अपने प्रश्नों का अच्छाउन
पाकर तथा अति तृप्त होकर वापस आये । जो मनुष्य गुणी होता है वही गुण के ग्रहण में समर्थ होता है, अन्य नहीं । स्वर्गवासी
केशवचन्द्र सेन ने स्वामी दयानन्द जी का बहुत ही आदर किया था। उनको अपने घर ले जाकर और सभा करके उनका
व्याख्यान सबको सुनाया । केशव बाबू के मकान में हमने जब पहले पहल स्वामी जी का भाषण सुना तो उस दिन हमने
एक नवीन बात देखी कि संस्कृत भाषा में ऐसी सरल और मधर वक्तृता थी जो पहले हमने कहीं न सुनी थी और न देखी
थी। वह ऐसी सहज संस्कृत में व्याख्यान देने लगे कि संस्कृत से अत्यन्त अनभिज्ञ व्यक्ति भी उनके व्याख्यान को समझने
लगा। और भी एक विषय में हमको बहुत आश्चर्य हुआ कि अंग्रेजी भाषा के न जानने वाले एक हिन्दू संन्यासी के
मुख
से
धर्म और समाज के सम्बन्ध में ऐसा उदारमत अर्थात् निष्पक्ष धर्म पहले कभी नहीं सुना था। नगेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने भी
ऐसा ही तिखा है।’oe

कलकत्ता के ब्रह्म समाज नेताओं से सम्पर्क
बाबू केशवचन्द्र सेन जी के घर में स्वामी जी ने ९ जनवरी, सन् १८७३ बृहस्पतिवार, तदनुसार पौष सुदि ११
संवत् १९२९ को व्याख्यान दिया था जिसके विज्ञापन हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला में चिपकाये गये थे। समाचार पत्र ‘इण्डियन
मिरर १२ जनवरी, सन् १८७३ में लिखा है-‘पण्डित दयानन्द सरस्वती-यह बड़ा विद्वान् पण्डित पिछले बृहस्पतिवार को
एशियाटिक म्यूजियम में विशेषतया इस अभिप्राय से गया कि वेद और उपनिषदों की कुछ प्रतियां खरीदे और उसके पश्चात्
बाबू केशवचन्द्र सेन के घर पर बहुत से ब्रह्म समाजियों से मिला और उनके प्रश्नों के उत्तर में अपने वैदिक सिद्धान्त वर्णन
किये । हम आशा करते हैं कि इन पंडित जी के मंजे (सुलझे हुए विचारों का छोटे-छोटे ट्रैक्टों ट्वारा प्रकाशित करने के लिये
एक सभा स्थापित की जायेगी ।

हेमचन्द्र जी कहते हैं कि ‘केशवचन्द्र जी की बाड़ी में वैदिकधर्म विषय पर व्याख्यान हुआ था जिसमें केशवचन्द्र
सेन तथा अन्य बहुत से सम्मानित व्यक्ति उपस्थित थे। सब लोग सन्तुष्ट हुए थे। बड़ा बाजार के कई हिन्दुस्तानी गुण्डे
झगड़ा करने लगे; परन्तु कुछ कर सके।’
‘ब्राह्मधर्म ग्रन्थ नहीं, ‘उपनिषदों की टीका कहो-एक दिन स्वामी जी ने महर्षि देवेन्द्रनाथ ठकुर-कृत’बाह्य्
प्रश’ हमसे सम्पूर्ण सुनने के पश्चात् कहा कि इसका नाम उपनिषद् की टीका छोड़ कर ब्रह्मधर्म क्यों रखा।