समस्त श्लोक उपनिषदों के हैं तो वह नाम उपाय नहीं। शो मा rगे । न
.’ में समाविष्ट की है। फिर लोग वहां के गानों । ना ।।।

महर्षि देवेन्द्रनाथ की खाड़ी में आत्म साधन पा वार्तालाप कला (Tutr FT गिरा

दा उसकी तैयारी हुई। महर्षि देवेन्द्रनाथ जी के बड़े पुत्र द्विजेन्द्रना। ताला लागी जी का गान गरी राय
गोगध्यान में लगे हुए थे। हमारे जाने से उनके ध्यान में विन हुआ। Fri दिजेन्द्रनारा के राती
और साहस विषय पर नाना प्रकार का घातला हुआ। स्वामी जी ने गोगट या पता
साशास्त्र निरीश्वर नहीं है । द्विजेन्द्रनाथ जी ने स्वामी जी से rf ती गाडी ॥’ने का असर
जी ने दूसरे दिन आने का वचन दिया, इसलिए दूसरे दिन ११ मचि हो । हेगन गया और पानी में
पधारे। उन्होंने स्वामी जी का बड़ा सत्कार किया। स्वामी जी ने उनको पति पदेश दिया और तक
पुत्र से आत्मसाधन पर बातचीत की। स्वामी जी आत्मा को खवाधीन मानते थे और यह परायीन । अन्त में सात
का प्रमाण दिखाकर उसका सन्तोष कर दिया।’

गृहस्थ के घर में रहना अच्छा नहीं समझते थे-‘महर्षि के घर में एक मंडप या उसमें एक टीम
और संस्कृत के श्लोक लिखे हुए थे। स्वामी जी ने उन्हें पढ़कर आनन्दसाम किया। मरने (स्वामी के कगरी
था कि आप हमारे महल की तीसरी मंजिल पर रहें और कछ दिन यहा निवास कों’ परततानी ?
मैं गृहस्थ के घर में रहना अच्छा नहीं समझता ।’ सन्ध्या के समय स्वामी जी वापिस चले गये ।

उस समय का वृत्तांत आदि ब्रह्म समाज की मासिक पत्रिका तत्वबोधिनी बगला में इस प्रकार वारी
माघ, संवत् १७९४ शालिवाहन, तदनुसार मंगलवार २१ जनवरी, सन १८७३, तदनुसार मात्र वदि ८ स्वत:
वार्षिकोत्सव में दोपहर को ब्रह्म समाज के प्रधान आचार्य महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के दिन में बार में नामांकन
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीयुत स्वामी दयानन्द सरस्वती से दोपहर से शाम तक धर्मालचना अर्थात विचार
मनुष्यों को उनसे विचार करके बहुत आनंद प्राप्त हुआ’ (फाल्गुन मास, संवत् १९७१४,न० ३५५. पृष्ट १८= १*.

प्रमोदकानन वाटिका में (जहां स्वामी जी उतरे हुए थे) देवेन्द्रनाथ तथा केशवद्रसेन के सि के र
स्वामी जी ने देवेन्द्रनाथ का चित्र देखकर कहा कि इसका स्वाभाविक अनुराग कधि श्रेणी की ओर है उ नको
को
हो
बहुत अनुराग गया था ।
रविवार, तदनुसार फागुन बदि ११, संवत् १९२९-इंडियन मिरर २२ फरवरी सन् १५०३ सें किखा है कि
‘२३ फरवरी, सन् १८७३ को गोराचांद दत के घर में ईश्वर और धर्म विषय में व्याान होगा। प्रसार व्य
जिसमें वेदों में ‘मूर्तिपूजा नहीं है’ इस विषय की अच्छी प्रकार व्याख्या की गई। इसमें पण्डित महेश पाये।
उपस्थित थे । समाप्ति पर उन्होंने बंगाली में अनुवाद करक लोगों को सुनाया परन्तु ठीक अनुवाद न कर सके के हो
बातें उन्होंने कहीं वह स्वामी जी ने नहीं कही थी। इस बात पर संस्कृत कालिज के विद्यावियों ने महेशचन्द्र के लिए
कि अब ऐसा स्वामी जी ने नहीं कहा तो आपने अपनी ओर से क्यों कह दिया? जिस पर गोलमाल कर मिले ।
चले गये ।

राजा बहादुर तक के लिये आगन्तुकों को छोड़कर जाना उचित न समझा-‘एक दिन शाम के समय
के तट पर, जो इस टीम में था, स्वामी जी और लोगों के साथ बैठे हुए थे कि राजा सोरेन्द्रो पड़ी के
गये । थोड़े समय पश्चात किसी ने स्वामी जी से आकर कहा कि राजा बहादुर आपको बुलाते हैं। याद ३३