कि मैं इस समय और लोगों के साथ बात कर रहे इसलिए में इनको इस उठ जाग ठौकरी ==
सुनकर राज साहब स्वयं हो आ गये और कुछ समय पश्चात का उत्पत्ति पर स्वामी जी से प्रस किया।
ने उतर दिया परन्तु वह समझ न सके इस पर स्वानो जो विरक्त हो गबे और बह कोध में आखर उठ कर दले गके ।
द्वेषी तदा रहने को अनर्गल बातें-तत्पश्चात उनके सेवकों और आश्रित लोगों ने स्वामी
बाठे ततोगों में प्रसिद्ध कनौ आरम्भ को । इस सम्बन्ध में दो दिनों सोमवश समाचार पत्र ने इस
लिखा-दिग्बजय करते हुए स्वामी दयानन्द कलकत्ते में पहुंचे हैं। शंकराचार्य ने दिग्विजय से अद्वैतमत स्थापन
जैसा जगत में कर दिया। स्वामी जी का ऐसा उदेश्व है या नहीं यह हम नही कह सकते परन्तु उनको वि
जैसी कि सही है, से स्पष्टतया पैक्ट है कि अपने पांडित्य का प्रयश करके प्रसिद्धि प्राप्त करे।'(२१ फगुन संवत् ।
तदनुसार २ मार्च सन १८७३) जब स्वामी जी के समर्दकों ने इसका उतर लिखातब सोमप्रकाश वाले पेना ।
उसे रिटरिनैशी समाचार का में भेज कर मुद्रित कराया। उन्हों दिनों वहा के अल्पबुद्धि लोगों ने प्रसिद्ध
कि यह कोई जर्मन-देशीय व्यक्ति है, जिसने हिंदू धर्म नष्ट करने के लिये संन्यासी का वेश बनाया हुआ है।

२ मार्च सन १८०३. रविवार तदनुसार फाल्गुन सुदि ४, संवत् १९२१-तीन बजे दिन के समय (वाराह नगर
बोनियो कम्पनी के हाल में हवन के नाम पर सरल संस्कृत में व्याख्यान दिया । बहुत लोग इकड़े थे सारा हात भय हुआ
था। ईश्वर का एक होना शैव और ईश्वर का भक्ति-सम्बन्ध, पंचमहायज्ञ की आज्ञा हवन को आवश्यकता और तत्सम्बन्धी
आवश्यक बातों को अच्छी प्रकार विस्तारपूर्वक वर्णन किया।

कलकत्ता में समाज सुधार-संबंधी व्याख्यान
९ मार्च रविवार, तदनुसार फागुन सुदि ११, संवत् १९२९ को स्वामी जी का व्याख्यान वाराह नगर-**#
के स्कूल में हुआ इसके विषय में ‘इन्डियन मिरर १५ मार्च सन् १८७३ में इस प्रकार लिखा-‘९ मार्च सन् १८७३ को
पंडित दयानन्द सरस्वती जी ने वराह नगर के गेट स्कूल (त्रि पाठशाला) में वैदिक सिद्धान्तों पर एक व्याख्यान दिया।
उस स्थान पर सम्मानित व्यक्तियों का एक विशाल समूह था। व्याख्यानदाता एक रेशमी वल पहने हुए बड़ी गम्भीरता के
साथ मंच पर पधारे और साढ़े तीन बजे व्याख्यान आरम्भ हुआ जिसके आरम्भ में सर्वशक्तिमान् पिता से प्रार्थना की और
फिर बड़ी शुद्ध, सुंदर और सरल संस्कृत में तीन घंटे से अधिक समय तक व्याख्यान दिया। उन्होंने वेदों में से बहुत सी
स्पष्ट और प्रबल युक्तियों द्वारा परमेश्वर की एकता और जातपात की हानियां तथा बाल्यकाल के विवाह के दोषों को सिद्ध
किया। उनके वचनों से सिद्ध होता है कि वह केवल बड़े विद्वान् हो नहीं प्रत्युत बड़े गहरे सोच-विचार के पुरुष (विचार)
हैं। उनकी शक्तियां बड़ी प्रबल और काटने वाली तथा उनका स्वभाव और वर्णनशैली बड़ी निर्भीक और वीरतापूर्ण है।
हम आशा करते हैं कि हमारे शिक्षित कोलकाता निवासी मित्र उनके आगामी व्याख्यानों को सुनने के लिये जाया करेंगे।
इसी प्रकार मार्च, सन् १८७३ के अन्त तक दो-तीन व्याख्यान और हुए और शिक्षित व्यक्तियों ने रुचिपूर्वक सत्योपदेश से
ताप उठाया।

पंडित हेमचन्द्र चक्रवर्ती जी कहते हैं कि स्वामी जी के डेरे पर दो बजे से सायंकाल तक ठहरने की आज्ञ थी
पूरी शाम हो जाने के पश्चात् किसी को न रहने देते थे। उन दिनों संस्कृत बोलते, केवल एक कौपीन रखते तथा शरीर पर
मिट्टी लगाते थे । पान या हुक्का खाते-पोते नहीं थे परन्तु तम्बाकू की नस्वार लेते और कुछ तम्बाकू के टुकड़े मुख में रखते
घे। कहते थे कि इससे बालों को लाभ होता