वेदालोचन-रहित संस्कृत शिक्षा से लोग व्यभिचारी तथा हानिकारक हो जाते हैं। दिन मापी जी ।।
जीवों में यह भी कहा था कि वेदालोचना-रहित संस्कृत शिक्षा से छ लाभ नहीं है, वह इसे लोग पुराणों के
लोगों की कुछ आंखें खुलीं ।
उपदेश से व्यभिचारी हो जाते हैं अथवा जो विचारशील ैं वह घर्म से पति और साफ हो जाते हैं । इससे
बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर कैम्बल साहब ने भी उन दिनों यह प्रस्ताव आया था कि गत कालिज उठा
या जावे। स्वामी जी ने इस बात को सुनकर कहा कि ऐसे संस्कृत कालिज वे रहने से छ लाभ नहीं दिन।
ये जाते। इसलिए मूलाजोड़’ में प्रसन्नकुमार ठाकुर ने जिस संस्कृत कालिज की स्थापना की थी, वहां जाकर र्थामी
दीने यह प्रस्ताव किया कि इसमें वेदों की शिक्षा दी जाये और इसी सम्बन्ध में उन्होंने ‘नैशनल’ पत्रिका के राणादक, मिस्टर
नवगोपाल मित्र को एक लेख भी भेजा
“आयुर्वेद के प्रचार में भी स्वामी जी की बहुत दृष्टि (ध्यान था) थी। इस विषय में उन्होंने डाक्टर महेन्द्रलाल
सरकार***से बहुत बातचीत की और उन्हें संस्कृत (ग्रन्थों) की आयुर्वेद विद्या के महत्व बतलाये ।

उस समय यह प्रस्ताव हुआ कि वे सब व्याख्यान, जो स्वामी जी ने कलकते में दिये ४, ट्रैवटी के रूप में बा:
केशवचन्द्र सेन साहब के निरीक्षण में प्रकाशित किये जावे परन्तु स्वामी जी के चले जाने के पश्चात् केशव बाबू ने पूरा ध्यान
परदिया, इसलिए यह काम न हुआ। फरूखाबाद के एक बड़े रईस, बाबू दगप्रिसाद जी, ने वर्णन किया कि उन दिनों हम
| भी कलकत्ता गये थे। स्वामी जी से पूर्व परिचय होने के कारण उनके दर्शन को गये। उस समय हवनके केनिपेध के विषय
में उपदेश कर रहे थे और उसे ‘धूम्रपान’ शब्द से पुकारते थे।*

गुणग्राही बाबू केशवचन्द्र अपनी आलोचना से कुद्ध नहीं हुए-पंडित बलदेव शर्मा ने वर्णन किया कि हम
स्वामी जी से कलकत्ते में १९२९ में मिले। वहां स्वामी जी का केशवचन्द्र सेन से भली प्रकार मेल-मिलाप हुआ। यह
अंग्रेजी का विद्वान् था। उसने एक ग्रन्थ बनाया था और उसके आरम्भ में एक श्लोक लिखा था, जिसमें ईश्वर के चरण
इत्यादि वर्णन किये हुए थे और (उसकी) संस्कृत भी शुद्ध न थी। इस श्लोक का स्वामी जी ने (यह कहकर) खंडन किया
कि एक तो इसके पद शुद्ध नहीं हैं, दूसरे परमेश्वर के पांव नहीं होते और यदि (इस श्लोक को) गुरु पर लगाओ तो वह
व्यापक नहीं । बाबू केशवचन्द्र सेन इस आक्षेप से क्रुद्ध नहीं हुए, प्रत्युत प्रसन्न हुए। बाबू साहब ने स्वामी जी को कहा कि
आप संस्कृत में व्याख्यान देते हैं, आप कुछ कहते हैं, लोग कुछ समझ लेते हैं, इसलिए आप भाषा में व्याख्यान दिया करें ।
स्वामी जी ने स्वीकार किया ।’

संस्कृत पाठशालाओं के विरुद्ध मत कैसे बना ?-‘वहां सात तालाब के समीप राममोहन राय का बगीचा था।
उसका गृहस्वामी स्वामी जी का बहुत आदर सत्कार किया करता था। वहीं स्वामी जी ने मुझसे कहा कि ‘बलदेव ! रईस
के लड़के अंग्रेजी-फारसी ने ले लिया, शेष कमीनों (दरिद्रता) के लड़के रह गये, वे संस्कृत के लिये रहे । ये ‘वानर’ हैं इनसे
कुछ नहीं होगा। वहीं से उनकी पाठशालाओं के विरुद्ध सम्मति बनी, और कहा कि मैं वेदभाष्य करूंगा और व्याख्यान
दुगा ।’

गजानन विद्यार्थी वहां एक दिन किसी मारवाड़ी का न्यौता जीमने चला गया और वहां से अधिक खा आया जिससे
१गा हो गया। स्वामी जी ने निषेध किया कि फिर न जाना परन्तु वह एक दिन फिर चला गया। सूचना मिलने पर स्वामी
जी ने उसको निकाल दिया।